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Wednesday, November 30, 2016

क्यों लोगों को गाँधी पसंद नहीं है ?



1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गाँधी जी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गाँधी जी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएंकिन्तु गाँधी जी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गाँधी जी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गाँधी जी ने इस हिंसा का विरोध नहीं कियावरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दीइसकी प्रतिक्रियास्वरूप गाँधी जी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

6. गाँधी जी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजीमहाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7. गाँधी जी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दियावहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा थाअत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला थाकिन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित कियाकिन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्धस्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया।

16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दियाउससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया।

18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित कियाजबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है

.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ?

२०. भगत सिंहराजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थीसुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थीउससे ये तीनोंखासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।

उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिएअगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता।



पढ़िये 'गांधी बेनकाब - हंसराज रहबर'  और 'गाँधी वध क्यों'?

Saturday, September 10, 2011

देश के बंटवारे का जिम्मेदार


१९३७ से १९३९ तक मजदूरों और किसानों के संघर्षों ने बड़ा जोर पकड़ा। यहाँ कांग्रेस ने जमीदारों का पक्ष लेकर किसानों और मजदूरों पर गोलियां चलाई। अक्सर जगहों पर कारखानेदार और जमींदार हिन्दू और मजदूर, किसान ज्यादातर मुसलमान होते थे। इससे मुस्लिम लीग को यह कहने का मौका मिला कि हिन्दू कांग्रेस सरकार मुसलमानों पर जुल्म ढा रही है। आखिर हिन्दू-मुस्लिम जनता का इस हद तक बंटवारा हो गया कि मुस्लिम लीग अपने १९४० के लाहौर अधिवेशन में पकिस्तान का प्रस्ताव पास करवाने में सफल हो गयी।
इसके बाद भी जिन्ना ने यह नहीं सोचा था की देश का बंटवारा होगा। वह तो प्रस्ताव का दबाब डालकर मुसलमानों के लिए कुछ ज्यादा नुमाइंदगी और कुछ ज्यादा रियायतें हासिल कर लेना चाहता था। अगर उसने वाकई बंटवारा चाह होता तो वह १९४५ में अपने पुराने बंगले को नया करवाने में २-३ लाख रुपये कभी खर्च न करता।
आमतौर पर लोग विभाजन के लिए जिन्ना या मुस्लिम लीग को जिम्मेदार ठहराते हैं। ऐसा सोचते समय वो गाँधी और कांग्रेस के चरित्र को भूल जाते हैं।
गाँधी ने यह भी कहा था की पकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा और जब बन गया तो इसकी सारी जिम्मेदारी कांग्रेस और जिन्ना की जिद पर डाल दी। भला सोचिये, जब माउन्टबेटन और जिन्ना से समझौते की बातचीत खुद गाँधी कर रहा था तो पकिस्तान देने का निर्णय करने वाले दूसरे कांग्रेसी कैसे हो गए? क्या गाँधी के बिना कांग्रेस द्वारा कोई निर्णय संभव था? फिर मजे की बात यह है कि इस टूटी फूटी सत्ता के हस्तांतरण को आज़ादी नाम देकर उसका श्रेय गाँधी को दिया गया और उसका ढिंढोरा पीटा गया।

देश का बंटवारा बड़ा ही घृणित अपराध था, उसका दंड असली अपराधी को मिलना ही चाहिए था और वह मिला। नाथूराम गोडसे ने ३० जनवरी, १९४८ को बंटवारे के लगभग ५ महीने बाद, विडला भवन में गाँधी की हत्या कर दी और उसने दिलेरी से ऐलान किया - "कि मैं नहीं चाहता था कि यह व्यक्ति नैसर्गिक मौत मरे, मैं उसकी हत्या करके इतिहास में प्रश्न चिह्न लगा देना चाहता था।"
प्रश्न चिह्न लगा, जो दिन दिन गहरा और बड़ा होता जा रहा है।

हमारा विश्वास है कि एक दिन भारत फिर से एक राष्ट्र होगा, सभी धर्मों को एक साथ सहेजे हुए।

जय स्वदेश।
From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar

Saturday, July 9, 2011

सुखदेव का पत्र गाँधी के नाम

शहीद सुखदेव ने, मार्च 1931 में घृणित गाँधी-इर्विन समझौते के बाद, अपनी फ़ाँसी से तीन दिन पहले, एक खत लिखकर गाँधी से कुछ पूछा था, इस खत का जबाब गाँधी ने उन्हे और इस देश को कभी नही दिया । आखिर कब तक हम सब सोते रहेंगे ? अब नयी पीढी फ़िर से पूछेगी वो सारे प्रश्न जिन्हे गाँधी, नेहरू और उनकी अंग्रेज सरकार ने दबा दिया, कभी अपने जुल्मों से, कभी प्रेस पर पाबंदी लगाकर और कभी गाँधी के उपदेशों से भरमाकर ।
उसी पत्र के कुछ अंश प्रस्तुत हैं …
“समझौता करके आपने अपना आन्दोलन रोक लिया है, इसके परिणामस्वरूप सत्याग्रह के सारे कैदी रिहा हो गये हैं । पर क्रान्तिकारी बन्दियों के बारे मे आपका क्या कहना है ? 1915 के गदर पार्टी के कैदी आज भी जेलों में पडे सड रहें हैं, जबकि उनकी सजायें पूरी हो चुकी हैं । मार्शल ला के सैकडों कैदी आज भी जीवित होते कब्रों में दफ़नाये हुये हैं । इसी तरह बबर अकाली लहर के दर्जनों कैदी जेल की यातनायें सहन कर रहे हैं । आधी दर्जन से ज्यादा केस – लाहौर, दिल्ली, चटगांव, बम्बई कलकत्ता आदि स्थानों पर चल रहे हैं, अनेक क्रान्तिकारी शामिल हैं जिसमे औरतें भी हैं, कई कैदी अपनी मौत का इन्तजार कर रहे हैं । इन सबके बारे में आपको क्या कहना है ? …  ” – पंजाबी पत्रिका हेम ज्योति, मार्च 1971
शहीद सुखदेव ने स्पष्ट शब्दों मे गाँधी पर यह आरोप लगाया था –“आप क्रान्तिकारी आन्दोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहे हैं ।”
शहीद का यह आरोप कितना सच है और कितना झूठ ये आप सभी अच्छी तरह जान चुके हैं। गाँधी की इस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकत कहा तक न्यायसंगत है ? क्या जेलों मे पडे अन्य कैदी उनके देशवासी नही थे, क्या उनका उद्देश्य देश को आजादी दिलाना नही था, क्या उन्होने देश के लिये कुछ नही किया था, देश के लिये अब उनका कोइ महत्व नही रह गया था ? परन्तु गाँधी को तो इस बारे में कुछ सोचना ही नही था, उसे क्रान्तिकारियों के बढते प्रभाव का डर जो सता रहा था, उसे अपने चहेते लालची नेहरू को देश का कर्णधार जो बनाना था ।
जय हिन्द, जय स्वदेश ।

Wednesday, June 8, 2011

गाँधी और भगत सिंह की फ़ाँसी


अंग्रेज सरकार अपनी कोइ भी बात गाँधी से गुप्त नही रखती थी । उसकी लडाई गाँधी से नहीं, भारत की जनता से थी ।

इर्विन से समझौते की बातचीत के दौरान गाँधी ने भगत सिंह और उनके साथियों को फ़ाँसी से बचाने के लिये क्या प्रयत्न किये, इस बारे में बहुत सी अफ़वाहें फ़ैली हुई हैं । लेकिन राष्ट्रीय लेखागार की फ़ाइलों से कुछ नये तथ्य प्रकाश में आये हैं, जिन्हे मन्मथनाथ गुप्त ने ‘नवनीत’ में प्रकशित अपने लेख में उद्धृत किया है । इर्विन ने अपने रोजनामचे में लिखा है –
“दिल्ली मे जो समझौता हुआ, उससे अलग और अन्त में मिस्टर गाँधी ने भगत सिंह का उल्लेख किया, उन्होंने फ़ाँसी की सजा रद्द करने के लिये कोइ पैरवी नही की, साथ ही उन्होंने वर्तमान परिस्थितियों में फ़ाँसी को स्थगित करने के बिषय में भी कुछ नही कहा ।” (फ़ाइल नं 5-45/1931 KW-2 गृहविभाग राजनीतिक शाखा)
20 मार्च को गाँधी वायसराय के गृह-सदस्य हर्बर्ट इमरसन से मिला । इमरसन ने भी रोजनामचे में लिखा है –
“मिस्टर गाँधी की इस मामले में अधिक दिलचस्पी नही मालुम हुई । मैने उनसे यह कहा कि वह सबकुछ करें ताकि अगले दिनों में सभाएँ न हों और लोगो के उग्र व्याख्यानों को रोकें । इस पर उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी और कहा जो कुछ भी मुझसे हो सकेगा मैं करुँगा ।” (फ़ाइल नं 33-1/1931)
क्या अर्थ हो सकता है इसका, इस बात के अतिरिक्त कि गाँधी ने स्वयं अपरोक्ष रूप में ब्रिटिश सरकार का सहयोग किया, हमारे महान क्रान्तिकारी भगत सिंह और उनके साथियों को फ़ाँसी दिलाने में । अगर गाँधी चाहते तो शायद भगत सिंह और उनके साथियों को फ़ाँसी न हुई होती । मगर उसने फ़ाँसी रोकने के लिये प्रयत्न करना तो दूर, स्थिति को सरकार के अनुकूल बनाए रखने में ब्रिटिश सरकार का सहयोग किया ।

Saturday, June 4, 2011

“आजाद” का अर्थ, गाँधी के अनुसार


30 अगस्त 1942 की शाम को घूमते समय गाँधी ने सुशीला नैयर से कहा –
“छह महिने के अन्दर हमें जेल से बाहर निकलना ही है । हमारी लडाई सफ़ल हुई तो भी और लोग हारकर बैठ गये तो भी । मैं नहीं जानता, लोग क्या करेंगे लेकिन मैं यह जानता हूँ कि लोग लडाई के लिये तैयार नही थे । हमने तैयारी की ही नहीं थी । हम नहीं जानते कि ईश्वर ने क्या सोच रखा है, जो भी हो, उनकी मर मिटने की तैयारी होनी ही चहिए । वे आजाद हुए बिना चैन नहीं लेंगे । अगर आजादी के लिये लडते-लडते वे खत्म हो भी गये तो खुद तो आजाद हो ही जायेंगे ।” (पृ 109)
अगर तैयारी की ही नही थी तो लडाई क्या सिर्फ़ इसलिये छेडी थी कि लोगों को मरवाया जाए ? यह कहाँ की अहिंसा है कि हिन्दुस्तानी तो मरें, लेकिन किसी अंग्रेज को ना मारा जाय ? फ़िर यह कहना कितना बडा सनकीपन है, कितनी निर्दयता है, कितनी बेवकूफ़ी है कि जो मरेंगे, वे तो आजाद हो ही जायेंगे ?
अगर मर जाना ही आजाद हो जाना है तो खुद गाँधी मरने की बार-बार प्रतिज्ञा लेकर भी क्यों नहीं मरा ?
·         1921 में सत्याग्रह शुरू करते समय उसने कहा था कि अगर मैंने एक साल में स्वराज ना लिया तो मेरी लाश समुद्र पर तैरती नजर आयगी ।
o   स्वराज्य नहीं मिला, मगर गाँधी जीवित रहा ।

·         नमक सत्याग्रह में डाँडी को मार्च करते समय घोषणा की थी कि अगर मैं सफ़ल ना हुआ तो साबरमती आश्रम में बापस नहीं आऊँगा ।
o   गाँधी असफ़ल रहा और साबरमती लौटने की बजाय सेवाग्राम नाम का दूसरा आश्रम बसा लिया । क्या यह उसकी प्रतिज्ञा की आत्मा का हनन नही था? क्या यह गोमाता के दूध की वजाय बकरी का दूध पीने की तरह उसकी प्रतिज्ञा के मात्र अक्षर का पालन नहीं था?

·         फ़िर इसी गाँधी ने एलान किया था कि पाकिस्तान बना तो मेरी लाश पर बनेगा ।
o   क्या हुआ सभी जानते हैं, पाकिस्तान बना, मगर गाँधी जीवित ही रहा । पाकिस्तान बना, लाशों पर ही बना पर वो लाशें निरीह, निरअपराध हिन्दुस्तानी सर्वसामान्य जनमानष की थीं ।
यह इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो क्या ?

                 From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar


Sunday, May 29, 2011

ग़ाँधी की महान प्रतिज्ञायें …


1918 में एक अस्थाई सन्धि से युद्ध बन्द हो गया । बर्फ़ यानी कि पानी के उपचार से गाँधी की तबियत सम्भली । लेकिन कमजोरी बहुत थी । गाँधी को बम्बई लाया गया । डाक्टर ने जाँच पडताल के बाद कहा –
“अगर आप दूध और इंजेक्शन नहीं लेंगे तो मैं आपके शरीर को नहीं भर सकता ।”
      “इंजेक्शन दीजिए, लेकिन दूध ना लूँगा ।” गाँधी ने उत्तर दिया ।
      “दूध के बारे मे आपकी क्या प्रतिज्ञा है ?”   
      “मैंने दूध का त्याग कर दिया है । वह मनुष्य की खुराक नहीं है यह तो मैं सदा मानता रहा हूँ ।”
डाक्टर ने चट कहा –
“आप बकरी का दूध लें तो भी मेरा काम हो जायेगा ।”
गाँधी लिखता है कि –
“मैं हारा । सत्याग्रह की लडाई के मोह ने मुझमें जीने का लोभ पैदा कर दिया और मैंने प्रतिज्ञा के अक्षर के पालन से संतोष मात्र कर उसकी आत्मा का हनन किया । …” (पृ 548)
गाँधी ने दूध त्यागने की प्रतिज्ञा दक्षिण अफ़्रीका में ली थी और अपनी ‘आत्मकथा’ के उसी प्रकरण में लिखा था –
“व्रत का हेतु तो दूध मात्र का त्याग था । पर व्रत लेते समय मेरे सामने गोमाता और भैंस मात्र ही थी । इससे और जीने की आशा से मैंने मन को ज्यों-त्यों फ़ुसला लिया । मेरे व्रत की आत्मा का हनन हो गया, यह बात मैंने बकरी माता का दूध लेते समय भी जान ली ।”(पृ 335)
बकरी का दूध पीने से गाँधी चंगा तो हो गया, लेकिन प्रतिज्ञाभंग करने की आत्मपीडा उसे जीवन भर सालती रही । अपने सत्य और अहिंसा की व्याख्या के बाद लिखा है –
“सत्य के पालन का अर्थ है, लिये हुए व्रत के शरीर और आत्मा की रक्षा; शब्दार्थ और भावार्थ दोनों का पालन । यहाँ मैंने आत्मा का, भावार्थ का हनन किया, यह मुझे रोज चुभता है ।”
गाँधी ने इस तरह की अनेक प्रतिज्ञाएँ की अपने महात्म्य को बढाने के लिये और फ़िर उन्हे जब चाहा तब तोड दिया किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिये । गाँधी में अपना सत्य झेलने की यह हिम्मत कभी पैदा नही हुई । उसकी ये प्रतिज्ञाएँ महज एक ढोंग थीं । वह उन्हें निहित स्वार्थों की सेवा के लिये रखता था और निहित स्वार्थों की सेवा ही के लिये तोडता भी रहता था ।

Saturday, May 28, 2011

ग़ाँधी का अंग्रेज साम्राज्य प्रेम


      1917 में ब्रिटेन की हालत बडी नाजुक थी । वह अमरीका को युद्ध में लाने में सफ़ल नहीं हो पाया था । हिन्दुस्तान से और अधिक सहायता भिजवाने के लिये वायसराय ने दिल्ली में युद्ध-परिषद बुलाने की सोची । गाँधी परिषद मे शरीक हुया जबकि उस समय देश के सर्वाधिक प्रभाबशाली नेता लोकमान्य तिलक, एनीबेसेंट और अली भाइयों (मुहम्मद अली, शौकत अली) को निमन्त्रित नही किया गया था ।
      परिषद मे गाँधी ने अपना भाषण हिन्दी मे दिया और अंग्रेजी मे एक वाक्य बोलकर युद्ध प्रस्ताव का समर्थन किया । गाँधी ने क्या कहा, इस बात को तो भुला दिया गया लेकिन वह हिन्दी में बोला इसे बडी बहादुरी माना गया और अखबारों में इसकी बडी चर्चा हुयी ।
         गाँधी ने वायसराय को बाद में एक पत्र लिखा, जिसमें था –
“मेरे वश की बात होती तो मैं ऐसे मौके पर होमरूल वगैरा का नाम तक ना लेता बल्कि साम्राज्य के इस आडे वक्त में सारे शक्तिशाली हिन्दुस्तानियों को उसकी रक्षा में चुपचाप बलिदान हो जाने को प्रेरित करता … ”
      इसके बाद प्रान्तीय राज्य सरकारों ने प्रान्तीय युद्ध परिषदें नियोजित करना शुरू कीं । बम्बई की सरकार ने केन्द्र की हिदायत पर गाँधी के अलावा तिलक और दूसरे राजनीतिज्ञों को भी निमन्त्रित किया गया ।
      दूसरे दिन बम्बई टाउनहाल मे में अधिबेशन शुरू हुआ । गवर्नर ने नियमपूर्वक कल्याणकारी व्रिटिश साम्राज्य का गुणगान किया । इसके बाद सहायता सम्बन्धी मुख्य प्रस्ताव सामने आया । तिलक अपनी जगह चुपचाप खडे हुए और उन्होंने गवर्नर से एक संशोधन पेश करने की इजाजत चाही जिसका आशय यह था कि सहायता तभी दी जा सकती है जब सरकार देशवाशियों को स्वशासन का अधिकार दे दे ।
      गवर्नर ने संशोधन पेश करने की इजाजत नहीं दी ।
      तिलक और देश के सभी बडे नेता बडे स्वाभिमान के साथ परिषद का बायकाट करके बाहर निकल आये ।
      ग़ाँधी मंच के एक कोने पर चुपचाप और स्थिर बैठा रहा । और गाँधी ने अपने इस कयरतापूर्ण कृत्य का अपनी आत्मकथा में कहीं उल्लेख तक नहीं किया ।

      अब रंगरूट भर्ती का काम शुरू हुआ । गाँधी ने एक महान ब्रिटिश राज्यभक्त की तरह यह काम बडे मनोयोग से शुरू किया । गाँधी ने खुद लिखा है –
      “मेरी दूसरी जिम्मेदारी रंगरूट भर्ती करने की थी ।”
अब उसने अपने अहिंषा के शिद्धान्त को ताक पर रखकर तर्क वितर्क करके लोगो को शस्त्र धारण करने का उपदेश देना शुरु किया । उसने यह दलील दी कि –
“ब्रिटिश साम्राज्य हमें शत्रुओं के आक्रमण से बचाने का प्रयत्न करता है तो ऐसे नाजुक समय में हमारा भी कर्तव्य होना चाहिये कि साम्राज्य की रक्षा के लिये अपने रक्त का अंतिम बिन्दु भी बहाने से संकोच ना करें ।”(गाँधीजी पृ 40)
सूरत मे उसने तिलक के विचारों से असहमत होकर, अंग्रेजो की सहायता के पक्ष मे एक भाषण दिया । उस भाषण की जो रिपोर्ट एक अखबार में छ्पी, गाँधी ने एक पत्र उसके बारे मे लिखा था और शिकायत की थी कि –
“आपके सम्वाददाता ने साम्राज्य को सहायता देने की बात को मेरे भाषण की मुख्य बात कह दिया … ।”
यानी अब सहायता की बात सीधे ढंग से कहने में भी शर्म आती थी; इसलिये यह सत्यवादी तथाकथित ‘महात्मा’ उसे सौ तरह से घुमा फ़िराकर कहता था ।
यह तो बस एक झलक थी गाँधी के अंग्रेज प्रेम की ।

                 From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar

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