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Wednesday, November 30, 2016

Lt. General Nathu Singh Rathore: A true leader


After getting freedom, a meeting was organized to select the first General of Indian Army. Jawahar Lal Nehru was heading that meeting. Leaders and Army officers were discussing to whom this responsibility should be given.

In between the discussion Nehru said, “I think we should appoint a British officer as a General of Indian Army as we don't have enough experience to lead the same.” Everybody supported Nehru because if the PM was suggesting something, how can they not agree?

But one of the army officers abruptly said, “I have a point, sir.”

Nehru said, “Yes, gentleman. You are free to speak.”

He said, “You see, sir, we don't have enough experience to lead a nation too, so shouldn't we appoint a British person as first PM of India?”

The meeting hall suddenly went quiet.

Then, Nehru said, “Are you ready to be the first General of Indian Army? He got a golden chance to accept the offer but he refused the same and said, Sir, we have a very talented army officer, my senior, Lt Gen Cariappa, who is the most deserving among us.”

The army officer who raised his voice against the PM was Lt. General Nathu Singh Rathore, the first Lt General of the Indian Army.

If only a few hundred of Selfless leaders come forward, they can change the image of Armed Forces and the image of our country.
Jai Hind Jai Bharat.


--Source: Facebook

Why congress wants to remove General V.K Singh?


All of us know that corrupt babus & politicians have penetrated the defense forces and we saw the result in Adarsh Scam and Sukna land Scam. In Any defense contract middlemen gets paid upto 15-20% of the deal, So with around $36 billion dollar defence budget arnd $5 billion dollar is grabbed by these middlemen. Who are the middlemen, mostty they are congressemen. Let us find out the reason for this kolaveri di ..?

1. General V.K singh was in charge of investigating the Land Scams and other corruption and he exposed the babu nexus in Army.

2. He started cleaning the army after becoming General and withheld lot of defense contracts marred in corruption giving sleepless nights to the ministry of defense.

3. He has even prepared a roadmap for future so that Defense forces can get the best deals without any corruption that ministry of defense hates.

4. He has also been offered a governors post by congress if he resigns. That he had already refused.

5. Last and the most important reason. He had sent a letter of support to Anna Hazare during his fast on 5th April.

And now congress wants to install a general who will be a puppet in the hands of congress just like our Mauni Baba. May be they are scared of General because he is a roadblock if the government wants to bring emergency in near future.

If you want to read in detail go thru this link - चौथी दुनिया से एक और सच

देश के सर्वोच्च न्यायालय में सेना और सरकार आमने-सामने हैं. आज़ादी के बाद भारतीय सेना की यह सबसे शर्मनाक परीक्षा है, जिसमें थल सेनाध्यक्ष की संस्था को सरकार दाग़दार कर रही है. पहली बार सेनाध्यक्ष और सरकार के बीच विवाद का फैसला अदालत में होगा. विवाद भी ऐसा, जिसे सुनकर दुनिया भर में भारत की हंसी उड़ रही है. यह मामला थल सेनाध्यक्ष जनरल विजय कुमार सिंह की जन्मतिथि का है. इस मामले में एक पीआईएल सुप्रीम कोर्ट के सामने है. वहां क्या होगा, यह पता नहीं, लेकिन इस विवाद को लेकर जो भ्रम फैलाया जा रहा है, उसे समझना ज़रूरी है. सारे तथ्य और सबूत इस बात को साबित करते हैं कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1951 है, लेकिन सरकार ने इस तथ्य को ठुकरा दिया और उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1950 मान ली. सरकार की इस ज़िद का राज़ क्या है. सरकार क्यों देश के सर्वोच्च सेनाधिकारी को बेइज़्ज़त करने पर तुली है, जबकि यह बात दिन के उजाले की तरह सा़फ है कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1951 है. साक्ष्य इतने पक्के हैं कि सुप्रीम कोर्ट के तीन-तीन भूतपूर्व चीफ जस्टिस ने अपनी राय जनरल वी के सिंह के पक्ष में दी है. इसके बावजूद अगर विवाद जारी है तो इसका मतलब है कि दाल में कुछ काला है.

1.  सरकार की नाराज़गी की कई वजहें हैं. भारतीय सेना एक ट्रक का इस्तेमाल करती है, जिसका नाम है टेट्रा ट्रक. भारतीय थलसेना टेट्रा ट्रक का इस्तेमाल मिसाइल लांचर की तैनाती और भारी-भरकम चीजों के ट्रांसपोर्टेशन में इस्तेमाल करती है. इन ट्रकों का पिछला ऑर्डर फरवरी, 2010 में दिया गया था, लेकिन ख़रीद में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की शिकायतें सामने आईं तो आर्मी चीफ वी के सिंह ने इस सौदे पर मुहर लगाने से इंकार कर दिया.  भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड यानी बीईएमएल लिमिटेड को जिस व़क्त इन ट्रकों की आपूर्ति का ठेका मिला, तब भारतीय सेना की कमान जनरल दीपक कपूर के हाथ में थी.

2. दरअसल, बीईएमएल द्वारा टेट्रा ट्रकों की ख़रीद का पूरा मामला संदेह के घेरे में है. एक अंग्रेजी अख़बार डीएनए के मुताबिक़, रक्षा मंत्रालय की ओर से अभी तक दिए गए कुल ठेकों में भारी धनराशि बतौर रिश्वत दी गई है. डीएनए के मुताबिक़, यह पूरा रैकेट 1997 से चल रहा है. बीईएमएल में उच्च पद पर रह चुके एक पूर्व अधिकारी के हवाले से यह भी ख़बर आई कि अभी तक कंपनी टेट्रा ट्रकों की डील से जुड़ा कुल 5,000 करोड़ रुपये तक का कारोबार कर चुकी है. यह कारोबार टेट्रा सिपॉक्स (यूके) लिमिटेड के साथ किया गया है. इसे स्लोवाकिया की टेट्रा सिपॉक्स एएस की सब्सिडियरी बताया जाता रहा है. बीईएमएल के इस पूर्व अधिकारी के मुताबिक़, 5,000 करोड़ रुपये के इस कारोबार में 750 करोड़ रुपये बीईएमएल एवं रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को बतौर रिश्वत दिए गए.

3.  बीईएमएल के एक शेयरधारक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के एस पेरियास्वामी राष्ट्रपति के हस्तक्षेप और सीबीआई जांच की मांग कर चुके हैं. वह कहते हैं, ख़रीद के लिए जितनी रकम की मंजूरी दी जाती है, उसका कम से कम 15 फीसदी हिस्सा कमीशन में चला जाता है. ऊपर से नीचे तक सबको हिस्सा मिलता है. मैंने 2002 में कंपनी की एजीएम में यह मुद्दा उठाया था, लेकिन इस पर चर्चा नहीं की गई. एक प्रतिष्ठित बिजनेस अख़बार ने यहां तक लिखा कि बीईएमएल की टेट्रा ट्रकों की डील को कारगर बनाने में जुटी हथियार विक्रेताओं की लॉबी ने आर्मी चीफ को आठ करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश भी की थी, जिसे जनरल वी के सिंह ने ठुकरा दिया.

 अब सवाल यह उठता है कि क्या आर्मी चीफ पर इसलिए पद छोड़ने का दबाव है, क्योंकि उन्होंने टेट्रा डील पर दस्तख़त नहीं किए थे? क्या बीईएमएल सेकेंड हैंड ट्रकों का आयात कर रही है और क्या स्लोवाकिया में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद हो गया है? क्या पुराने ट्रकों की मरम्मत को घरेलू उत्पादन के तौर पर दिखाया जा रहा है? रविंदर ऋषि कौन है, उसे इतने रक्षा सौदों का ठेका क्यों दिया जा रहा है? इस लॉबी के लिए सरकार में काम करने वाले लोग कौन हैं? अगर सरकार इन सवालों का जवाब नहीं देती है तो इसका मतलब यही है कि आर्मी चीफ को ठिकाने लगाने के लिए मा़िफया और अधिकारियों ने मिलजुल कर जन्मतिथि का बहाना बनाया है.

4. जनरल वी के सिंह ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए एक प्लान तैयार किया, यह प्लान डिफेंस मिनिस्ट्री में लटका हुआ है. उन्होंने इस बीच कई ऐसे काम किए, जिनसे आर्म्स डीलरों और बिचौलियों की नींद उड़ गई. सिंगापुर टेक्नोलॉजी से एक डील हुई थी. इस कंपनी की राइफल को टेस्ट किया गया, उसके बाद जनरल वी के सिंह ने रिपोर्ट दी कि यह राइफल भारत के लिए उपयुुक्त नहीं है. भारतीय सेना को नए और आधुनिक हथियारों की ज़रूरत है. इस ज़रूरत को देखते हुए वह अगले एक-दो सालों में भारी मात्रा में सैन्य शस्त्र और नए उपकरण ख़रीदने वाली है. ख़ासकर, भारत इस साल भारी मात्रा में मॉडर्न असॉल्ट राइफलें ख़रीदने वाला है. भारत का सैन्य इतिहास यही बताता है कि आर्म्स डील के दौरान जमकर घूसखोरी और घपलेबाज़ी होती है. जनरल वी के सिंह सेना के अस्त्र-शस्त्रों की ख़रीददारी में पारदर्शिता लाना चाहते हैं. वह एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहते हैं, जिसमें सैनिकों को दुनिया के सबसे आधुनिकतम हथियार मिलें, लेकिन कोई बिचौलिया न हो और न कहीं किसी को दलाली खाने का अवसर मिले

5. जबसे वह सेनाध्यक्ष बने हैं, तबसे भारतीय सेना पर कोई घोटाले या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा. भ्रष्टाचार के जो पुराने मामले थे, उन्हें न स़िर्फ निपटाया गया, बल्कि उन्होंने आदर्श जैसे घोटाले की जांच में एजेंसियों की मदद की. आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के ज़मीन घोटाले में जनरल वी के सिंह ने मुस्तैदी दिखाई. सेना की कोर्ट ऑफ इनक्वायरी का गठन किया, जिसमें दो पूर्व सेनाध्यक्षों-जनरल दीपक कपूर और जनरल एन सी विज सहित कई टॉप अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया. इन सबका नतीजा यह हुआ कि आर्म्स डीलरों की लॉबी, अधिकारी, ज़मीन मा़िफया और ऐसे कई सारे लोग जनरल वी के सिंह के ख़िला़फ लामबंद हो गए और उनकी जन्मतिथि के विवाद को हवा दी.

6. जबसे वह सेनाध्यक्ष बने हैं, तबसे भारतीय सेना पर कोई घोटाले या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा. भ्रष्टाचार के जो पुराने मामले थे, उन्हें न स़िर्फ निपटाया गया, बल्कि उन्होंने आदर्श जैसे घोटाले की जांच में एजेंसियों की मदद की. आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के ज़मीन घोटाले में जनरल वी के सिंह ने मुस्तैदी दिखाई. सेना की कोर्ट ऑफ इनक्वायरी का गठन किया, जिसमें दो पूर्व सेनाध्यक्षों-जनरल दीपक कपूर और जनरल एन सी विज सहित कई टॉप अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया. इन सबका नतीजा यह हुआ कि आर्म्स डीलरों की लॉबी, अधिकारी, ज़मीन मा़िफया और ऐसे कई सारे लोग जनरल वी के सिंह के ख़िला़फ लामबंद हो गए और उनकी जन्मतिथि के विवाद को हवा दी.

7. उन्होंने सेना में मीट की सप्लाई करने वाले मीट कारटेल का स़फाया कर दिया, वे लोग जो मीट सप्लाई करते थे, वह ठीक नहीं था. जनरल वी के सिंह ने इसके लिए ग्लोबल टेंडर की शुरुआत की, ताकि दुनिया का सबसे बेहतर मीट सेना के जवानों को मिले.

8. सेनाध्यक्ष बनते ही उन्होंने सेना में मौजूद भ्रष्टाचार और मा़िफया तंत्र को ख़त्म करना शुरू कर दिया. लगता है, यह बात नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में बैठे अधिकारियों को ख़राब लगी. देश में सरकारी तंत्र कैसे चल रहा है, यह एक स्कूली बच्चे को भी पता है. लगता है, देश में जो ईमानदार और आदर्शवादी लोग हैं, उनके लिए सरकारी तंत्र में कोई जगह नहीं रह गई है. उन्हें ईनाम मिलने की जगह सज़ा दी जाती है और जलील किया जाता है.

क्या इस देश में अलग-अलग नागरिकों के लिए अलग-अलग क़ानून हैं या फिर यह मान लिया जाए कि इस देश को मा़िफया सरगना और सरकार में बैठे उनके दलाल चला रहे हैं. पूरे देश की जनता एक ऐसे घिनौने वाक्ये से रूबरू हो रही है, जिसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पिछले सात सालों में जिस तरह देश में संवैधानिक और राजनीतिक संस्थानों की बर्बादी हुई है, वैसी पहले कभी नहीं हुई. हैरानी की बात यह है कि सरकार एक तऱफ यह कह रही है कि थल सेनाध्यक्ष झूठ बोल रहे हैं और दूसरी तऱफ वह उनसे डील भी करती है कि उन्हें किसी देश का राजदूत या किसी राज्य का गवर्नर बना दिया जाएगा. यही नहीं, यह धमकी भी दी जा रही है कि अगर वह कोर्ट गए तो उन्हें सेनाध्यक्ष के पद से ब़र्खास्त कर दिया जाएगा.

इसलिए जनरल वी के सिंह को ख़ुद के लिए नहीं, बल्कि इस संस्था की गरिमा बचाने के लिए कोर्ट में जाना चाहिए. अगर वह नहीं गए तो इसका मतलब यही है कि देश के माफिया, अधिकारी और नेता जब चाहें, गिरोह बनाकर भविष्य के सेनाध्यक्षों को नीचा दिखा सकते हैं, उन्हें मनचाहा काम कराने के लिए मजबूर कर सकते हैं. जनरल वी के सिंह लड़ रहे हैं, यह अच्छी बात है. हो सकता है, भविष्य में किसी दूसरे ईमानदार सेनाध्यक्ष के साथ फिर ऐसा हो, लेकिन वह जनरल वी के सिंह की तरह लड़ भी न सके.

क्यों लोगों को गाँधी पसंद नहीं है ?



1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गाँधी जी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गाँधी जी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गाँधी जी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गाँधी जी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गाँधी जी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गाँधी जी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

6. गाँधी जी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7. गाँधी जी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया।

16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया।

18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया, जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है

.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़? विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी...मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५ टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा....फिर पुलिस ने मजबूर हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया.... और वो हिंदू--- गाँधी मरता है तो मरने दो ---- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे...,,, रिपोर्ट --- जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट..... फॉर गाँधी वध क्यो ?

२०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।

उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता।



पढ़िये 'गांधी बेनकाब - हंसराज रहबर'  और 'गाँधी वध क्यों'?

Whistle Blower Protection Bill, 29 March 2012, अरविंद केजरीवाल



      लगता है इस काँग्रेस सरकार को और इस देश के सभी सांसदों को लगता है भारत एक हमेशा ही सोने वाले मूर्खों का देश है। हम कुछ लोग शर्म से ये सच स्वीकारते हैं और कुछ गर्व से। उदाहरण देखिये, मूर्ख जनता के बुद्धिमान सांसदों का करतब -- 
अरविंद केजरीवाल के ही शब्दों में -- "29 मार्च 2012 को काँग्रेस पार्टी की भारत सरकार ने बिना चर्चा के कुछ ही मिनटों में दो बिल पास किए। उनमे से एक है Whistle Blower Protection Bill ये भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को संरक्षण देने की वजाय उनको ज्यादा प्रताड़ित करने के लिए बनाया गया है। अभी तक अगर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठता था तो वो कहीं जाके कम से कम शिकायत कर लेता था। उसके ऊपर फिर माफिया तरह तरह से उसे प्रताड़ित करते थे और कई बार तो उनकी हत्या कर दी जाती थी। इससे लोगों को संरक्षण देना तो दूर, इस कानून मे लिखा है यदि कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करेगा, यदि उसकी शिकायत में पर्याप्त सबूत नहीं होंगे तो उसे दो साल के लिए जेल में डाल दिया जाएगा। तो ये भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सरक्षण देने के लिए बनाया है कि उनकी आवाज कुचलने के लिए बनाया है?

सरकार की नियत में खोट है, सरकार अच्छे बिल लाना ही नहीं चाहती। सरकार जो भी कदम उठा रही है, उससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है और दुख की बात ये है की संसद भी सरकार के ऐसे लाये हुये बिलों पर अपना ठप्पा लगा कर पास करती जा रही है।"





 बहुत संभव है कि कुछ दिनों में ये vedio या blog बंद हो जाए।

तथाकथित महात्मा के इस देश पर उपकार: तुष्टीकरण की शुरुआत



5 मार्च, 1931 को इर्विन के साथ अपने समझौते के क्षण से ही गांधी जी मुस्लिम प्रश्न का हल खोजने में जुट गये थे। उन दिनों बनारस, कानपुर, मिर्जापुर आदि अनेक नगरों में भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। कानपुर के मुसलमानों ने भगत सिंह की फांसी के विरोध में प्रदर्शन में शामिल होने से मना कर दिया, जिससे दंगा भड़क उठा। हिन्दू मुस्लिम एकता के बड़े प्रचारक और कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी की एक मुस्लिम मुहल्ले में हत्या कर दी गयी। इस प्रक्षोभक वातावरण में गांधी जी की प्रेरणा से कराची के कांग्रेस अधिवेशन के अंत में 1 अप्रैल को कराची में ही जमीयत उल उलेमा का अधिवेशन रखा गया, जिसमें गांधी जी ने कानपुर के दंगों के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराया, उसके लिए शर्मिंदगी प्रगट की, उनकी ओर से मुसलमानों से क्षमायाचना की, उलेमा से मुस्लिम समस्या को हल करने की प्रार्थना की गई। महादेव देसाई ने अपनी डायरी के 12वें खंड में गांधी जी के उस भाषण को विस्तार से दिया है। गांधी जी ने कहा, 'इस बारे में मैं उलेमा की कदमबोसी (चरण चूमकर) करके उनकी मदद चाहता हूं। अगर हम इसमें कामयाब नहीं हुए तो गोलमेज सम्मेलन में जाना लगभग बेकार-सा होगा। मैं नहीं चाहता कि यह हुकूमत पंच बनकर हमारी आपसी लड़ाई का फैसला करे। उलेमा से मैं नम्रता से कहूंगा कि वे इस बारे में बहुत कुछ मदद कर सकते हैं। कांग्रेस और हिन्दू की हैसियत से मैं कहता हूं कि मुसलमान जो चाहें, मैं देने को तैयार हूं। मैं बनियापन नहीं करना चाहता हूं कि आप जिस चीज की ख्वाहिश करते हों, उसे एक कोरे कागज पर लिख दीजिए और मैं उसे कबूल कर लूंगा। जवाहर लाल ने भी जेल से यही बात कही थी।

वाह रे इंसाफ, वाह रे तुष्टीकरण, गलत को गलत न कहना कायरता नहीं तो क्या है? निरपराध को दोषी बताना स्वयम में एक अपराध नहीं तो क्या है? ... वाह रे गांधीत्व, वाह रे महात्म्य, वाह रे देश भक्त।

Friday, September 30, 2016

मैं नास्तिक क्यों हूँ: भगत सिंह Main Nastik Kyon Hun: Bhagat Singh


(यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था जो भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है. इस लेख में उन्होंने ईश्वर के प्रति अपनी धारणा और तर्कों को सामने रखा है. यहाँ इस लेख का कुछ हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है.)

प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी. प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है. उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है. लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी. यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ करना. यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है. जहाँ तक मेरा संबंध है, मैं शुरू से ही मानता हूँ कि इस दिशा में मैं अभी कोई विशेष अध्ययन नहीं कर पाया हूँ. एशियाई दर्शन को पढ़ने की मेरी बड़ी लालसा थी पर ऐसा करने का मुझे कोई संयोग या अवसर नहीं मिला. लेकिन जहाँ तक इस विवाद के नकारात्मक पक्ष की बात है, मैं प्राचीन विश्वासों के ठोसपन पर प्रश्न उठाने के संबंध में आश्वस्त हूँ. मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन, परम-आत्मा का, जो कि प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करती है, कोई अस्तित्व नहीं है.

हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है. जहाँ तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-(i) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और आफतों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं. कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है. कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है. नीरो ने सिर्फ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए. और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ-के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. एक चंगेज़ खाँ ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं. तब फिर तुम उस सर्वशक्तिमान अनंत नीरो को जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य दुख देता रहा है और अभी भी दे रहा है, किस तरह न्यायोचित ठहराते हो? फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं? 

मैं पूछता हूँ कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी-ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है? सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी? इन सब बातों का तुम्हारे पास क्या जवाब है? तुम यह कहोगे कि यह सब अगले जन्म में, इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और ग़लती करने वालों को दंड देने के लिए हो रहा है. ठीक है, ठीक है. तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे जो हमारे शरीर को जख्मी करने का साहस इसलिए करता है कि बाद में इस पर बहुत कोमल तथा आरामदायक मलहम लगाएगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापकों तथा सहायकों का यह काम कहाँ तक उचित था कि एक भूखे-खूँख्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि यदि वह उस जंगली जानवर से बचकर अपनी जान बचा लेता है तो उसकी खूब देख-भाल की जाएगी? इसलिए मैं पूछता हूँ, ‘‘उस परम चेतन और सर्वोच्च सत्ता ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों का सृजन क्यों किया? आनंद लुटने के लिए? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?’’ मुसलमानों और ईसाइयों. हिंदू-दर्शन के पास अभी और भी तर्क हो सकते हैं. मैं पूछता हूँ कि तुम्हारे पास ऊपर पूछे गए प्रश्नों का क्या उत्तर है? तुम तो पूर्व जन्म में विश्वास नहीं करते. तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्व जन्मों के कुकर्मों का फल है. मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व की उत्पत्ति के लिए छः दिन मेहनत क्यों की और यह क्यों कहा था कि सब ठीक है. उसे आज ही बुलाओ, उसे पिछला इतिहास दिखाओ. उसे मौजूदा परिस्थितियों का अध्ययन करने दो. फिर हम देखेंगे कि क्या वह आज भी यह कहने का साहस करता है- सब ठीक है.


'राष्ट्र सर्वप्रथम सर्वोपरि'
वन्दे मातरम...
जय हिंद... जय भारत...


Wednesday, January 29, 2014

गौ हत्या और गांधी


समस्त मानवीय गुण दोष एवं कूटनीतिक भूलो को नजर अंदाज कर के एक बार को मैं गांधी जी को महान मान भी लेता अगर उन्होंने ......

"गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने से इंकार नहीं किया होता" 

15 अगस्त 1947 को भारत के आजाद होने पर देश के कोने - कोने से लाखों पत्र और तार प्रायः सभी जागरूक व्यक्तियों तथा सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भारतीय संविधान परिषद के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के माध्यम से गांधी जी को भेजे गये जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अब देश स्वतन्त्र हो गया हैं अतः गौहत्या को बन्द करा दो । तब गांधी जी ने कहा कि -

" राजेन्द्र बाबू ने मुझको बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हजार पोस्ट कार्ड , 25 - 30 हजार पत्र और कई हजार तार आ गये हैं । हिन्दुस्तान में गौ - हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं , उनके साथ जबरदस्ती करना होगा . .. . जो आदमी अपने आप गौकुशी नहीं रोकना चाहते , उनके साथ मैं कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करें । इसलिए मैं तो यह कहूँगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बन्द होना चाहिये इतना पैसा इन पर फैंक देना मुनासिब नहीं हैं । मैं तो अपनी मार्फत सारे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बन्द कर दें । भारतीय यूनियन कांग्रेस में मुसलमान , ईसाई आदि सभी लोग रहते हैं । अतः मैं तो यही सलाह दूँगा कि विधान - परिषद् पर इसके लिये जोर न डाला जाये । " 

- पुस्तक - 'धर्मपालन' भाग - दो, सस्ता साहित्य मंडल , नई दिल्ली , पृष्ठ - 135

Sunday, October 13, 2013

राम प्रसाद बिस्मिल और जवाहर लाल नेहरू: काकोरी लूट का मुकदमा


काकोरी कांड : ९ अगस्त १९२५ को काकोरी के पास महान क्रन्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में कुछ क्रांतिकारियों ने ८ डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर रोककर सरकारी खजाना लूट लिया।

 

२६ सितम्बर १९२५ तक ब्रिटिश पुलिस ने समूचे देश में ४० लोग गिरफ्तार किये, उन पर मुकदमा चलाया गया और पूरे डेढ़ साल तक लखनऊ हजरतगंज चौराहे पर बड़े डाकघर के पास स्थित रिकथियेटर नाम के सिनेमाघर को अदालत बनाकर उसमें काकोरी कांड के मुक़दमे का तांडव खेला गया।

इसमें रामप्रसाद बिस्मिल समेत चार लोगों, ठाकुर रोशन सिंह, अश्फाक उल्ला खां व राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी तथा अन्य १६ को आजीवन कारावास से लेकर कम से कम ५ बर्ष की सजाओं का आदेश दिया गया।

 

ये तो थी कहानी, अब कुछ तथ्य और --

 

अंग्रेज सरकार की ओर से १० लाख रुपये पानी की तरह बहाए गए और सरकारी वकील की हैसियत से पंडित जगत नारायण मुल्ला को ५०० रुपये रोज के मेहनताने पर रखा गया (याद रहे मुकदमा डेढ़ साल चला), और ये वही व्यक्ति था जो मैनपुरी षड्यंत्र में भी सरकारी वकील रह चुका था और पंडित जवाहरलाल नेहरु का साला था।

 

बिस्मिल ने ३० बर्ष और ६ महीने की आयु पायी। कैसी विडम्बना है कि चीन में रामप्रसाद बिस्मिल को लोग ज्यादा जानते हैं। लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में उनका चित्र मिलेगा पर हिन्दुस्तान में शायद नहीं।

 

अब तो जागो अब काले अंग्रेजों से मुक्त भारत बनाओ, अब तो गद्दारों को हटाओं, कब तक इन्हें अपना खून पिलाकर पालोगे।

 

बिस्मिल ने एक शेर अपने बारे में कहा था --
 

खुश्बू-ए-वतन, जब भी इधर घूम के निकले,

कहिएगा मेरे नक्शेकदम चूम के निकले,

बिस्मिल का नहीं, हिंद पाक़ीज जमीं के,

आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले।

पत्रिका संस्कारम से, अंक मार्च २०१३
 

Thursday, August 11, 2011

नेहरू की जगह नेता जी होते तो देश नही बंटता


मैं यह पूरे विश्वास मे साथ कह सकता हूँ कि इस देश का हर एक बुद्धिजीवी ये जान चुका है कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की इस देश को कितनी जरूरत है, आज प्रत्येक समझदार व्यक्ति ये कहता है कि अगर नेहरू की जगह नेता जी होते तो आज देश नही बंटा होता, और अगर देश नही बंटा होता तो इस देश की आंतकवाद जैसी विकराल समस्या का नमोनिशान न होता।

उदाहरण आपके सम्मुख है—
24 जनवरी 2011 टाइम्स नेटवर्क
कोलकाता।। ' नेताजी सुभाषचंद्र बोस आज होते तो भारत के विकास की रफ्तार कई गुना तेज होती और हम चीन से आगे होते।' इन्फोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति का कुछ यही मानना है।

नायारण मूर्ति के मुताबिक जवाहरलाल नेहरू की उद्योगों को न पनपने देने की नीतियों और लाइसेंसी राज के खिलाफ नेताजी बेहद सक्षम साबित होते। नेताजी होते तो शायद भारत का विभाजन भी नहीं हुआ होता। नारायण मूर्ति ने कोलकाता में नेताजी मेमॉरियल ओरिएंटेशन के दौरान यह बात कही। 
सॉफ्टवेयर गुरु मूर्ति ने कहा कि केंद्र नेताजी को उचित सम्मान नहीं दे रहा है। मूर्ति ने कहा कि आजादी के बाद नेताजी होते तो भारत कुछ अलग देश होता। नेताजी, नेहरू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, और सी. राजगोपालाचारी की टीम अगर एक साथ मिलकर काम करती तो भारत के लिए चमत्कार कर सकती थी।
भारत आज वहां होता, जहां चीन खड़ा है। नेताजी कद्दावर थे। नेताजी ही वह शख्स थे, जिन्होंने महात्मा गांधी से असहमत होने का साहस दिखाया था।
    
       “नेताजी ही वह शख्स थे, जिन्होंने महात्मा गांधी से असहमत होने का साहस दिखाया था”, और किसी मे इतनी हिम्मत नही थी, यह वाक्यांश एक ओर नेहरू और दूसरे नरम दल वाले नेताओं की बुजदली और सत्तालोलुपता दिखाता है और दूसरी तरफ़ गाँधी का महात्म्य युक्त आंतक।

नेता जी की मौत, एक हादसा या हत्या


     ये रहस्य मैं सुलझाने नही जा रहा हूँ, आपको केवल हमारी सरकारों के तथाकथित प्रयासों से अवगत कराने की कोशिश मात्र है, पुन: मैं एक समाचार पत्र के टुकडे आप तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूँ। जय हिन्द।

23 जनवरी 2009 नवभारत टाइम्स
     नई दिल्ली: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत कब और कैसे हुई - यह आज तक रहस्य बना हुआ है। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए तीन आयोग गठित हुए, तीनों ने अपनी रिपोर्ट भी सौंपी, लेकिन मिस्ट्री अब भी बरकरार है। इस रहस्य की तह तक जाने में जुटे लोगों का कहना है कि सरकार इसे लेकर कतई गंभीर नहीं है और न ही सरकार ने इसे सुलझाने में मुखर्जी कमिशन की मदद की। बावजूद इसके इन लोगों को भरोसा है कि एक न एक दिन सच सामने आएगा। इसी सच को जानने के लिए आरटीआई का सहारा लिया जा रहा है, ताकि नेताजी की मौत से जुड़े कागजात के सहारे सचाई को सामने लाया जा सके।

मौत की मिस्ट्री
नेताजी के बारे में कहा जाता रहा है कि उनकी मौत 18 अगस्त 1945 को ताइपे में एक प्लेन क्रेश में हुई। लेकिन, बाद में इस पर कई सवाल उठने लगे। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए 1956 में शाहनवाज कमिटी का गठन किया गया, जिसने ताइवान गए बिना ही सिर्फ जापान में कुछ लोगों से बात करके यह रिपोर्ट दे दी कि नेताजी की मौत प्लेन क्रेश में ही हुई थी। इस रिपोर्ट पर कमिटी में शामिल नेताजी के बड़े भाई सुरेश चंद्र बोस ने कड़ी आपत्ति जताई। ज्यादातर सांसद भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं थे।

1970 में खोसला कमिशन का गठन किया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट में यही बात दोहराई। लेकिन 1978 में मोरारजी देसाई ने संसद में यह कहा कि कुछ ऐसे कागजात मौजूद हैं, जिनसे नेताजी की मौत प्लेन क्रेश में होने की बात स्वीकार नहीं की जा सकती। इसके बाद 1999 में मुखर्जी कमिशन ने इस गुत्थी को सुलझाने की जिम्मेदारी ली। कमिशन ने 2005 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि नेताजी की मौत प्लेन क्रेश में नहीं हुई थी। ताइवान ऑथॉरिटी ने भी कहा कि 14 अगस्त से 20 सितंबर 1945 के बीच वहां कोई प्लेन क्रेश नहीं हुआ था। लेकिन आयोग यह बताने में सफल नहीं हो पाया कि नेताजी की मौत कब, कैसे और कहां हुई थी।

क्या छुपा रही है सरकार
मिशन नेताजी से जुड़े चंद्रचूड़ घोष कहते हैं कि सरकार इस गुत्थी को सुलझाने में कतई दिलचस्पी नहीं ले रही। मुखर्जी आयोग को भी पूरी मदद नहीं दी गई। जब नेताजी की मौत से जुड़ी कैबिनेट सेक्रेटरी लेवल की एक फाइल मांगी गई तो कहा गया कि वह नष्ट हो चुकी है। सरकार का कोई भी मंत्रालय कोई भी जानकारी नहीं दे रहा है। एक तरफ सरकार कह रही है कि वह कुछ नहीं छुपा रही है और दूसरी तरफ जानकारी मांगने पर सेंट्रल इन्फर्मेशन कमिशन से कहा गया कि वे कागजात इतने संवेदनशील हैं कि अगर उन्हें रिलीज किया गया तो दूसरे देशों से हमारे रिलेशन खराब होंगे और आंतरिक शांति भंग होगी। यह भी कहा गया कि कागजात रिलीज होने पर पश्चिम बंगाल जल उठेगा। घोष कहते हैं कि हम चाहते हैं कि नेताजी से जुड़े जितने डॉक्युमेंट्स हैं वे पब्लिक के सामने आएं, सिटिजन इनक्वायरी हो और इस गुत्थी को सुलझाया जाए।

सच जानना है अधिकार
यूथ फॉर इक्वैलिटी भी मिशन नेताजी की मुहिम में साथ आ गया है। इसके अध्यक्ष डॉ. कौशल कांत मिश्रा का कहना है कि आरटीआई के जरिए हम सच की तह तक पहुंचने की कोशिश करेंगे। नेताजी सुभाष क्रांति मंच के संयोजक वी. पी. सैनी कहते हैं कि यह हमेशा मिस्ट्री नहीं रह सकती। चाहे कितने भी संवेदनशील कागजात हों उन्हें रिलीज करना चाहिए ताकि पूरी साजिश का खुलासा हो सके। सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं दिख रही है इसलिए पब्लिक प्रेशर बनाना बेहद जरूरी है।
क्या विचार है आपके? और आप जो भी कर सकते हैं करने की कोशिश करें। ज़य हिन्द।


नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मौत


ये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है कि हमारे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मौत कैसे हुई? मैं यहां कुछ नया कहने वाला नही हूँ, मेरी ये कोशिश केवल एक समाचार पत्र का एक टुकडा सुरक्षित करने की कोशिश मात्र है,  जय हिन्द।

11 अगस्त 2011 इन्डियाटाइम्स
     वाराणसी -- नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत के रहस्य को सुलझाने के लिए कई कमिटी और कमिशन बिठाए गए, कितनी किताबें लिखी गईं, लेकिन नेताजी के एक सहयोगी और प्रत्यक्षदर्शी से किसी ने कभी संपर्क नहीं किया।
     आजमगढ़ में इस्लामपुरा, बिलरियागंज में रहने वाले 107 साल के निजामुद्दीन खुद को आजाद हिंद फौज में नेताजीका ड्राइवर बताते हैं। निजामुद्दीन के मुताबिक उन्होंने 1942 में आजाद हिंद फौज जॉइन करने के बाद 4 साल नेताजी के साथ गुजारे।
     निजामुद्दीन को यकीन है कि नेताजी की मौत 1945 के प्लेन हादसे में नहीं हुई थी। निजामुद्दीन कहते हैं, ‘यह कैसे हो सकता है क्योंकि प्लेन हादसे के करीब 3-4 महीने बाद मैंने उन्हें कार से बर्मा और थाईलैंड की सीमा पर सितंगपुर नदी के किनारे छोड़ा था।‘

     निजामुद्दीन को इस बारे में कुछ भी पता नहीं कि जब उन्होंने नेताजी को नदी के किनारे छोड़ा, उसके बाद क्या हुआ। निजामुद्दीन के मुताबिक वह नेताजी के साथ ही रहना चाहते थे, लेकिन नेताजी ने उन्हें आजाद भारत में मिलने का वादा करके वापस भेज दिया था।
     करीब 10 साल बाद निजामुद्दीन की मुलाकात नेताजी के करीबी एक स्वामी से हुई थी। स्वामी नेताजी के संपर्क में थे। निजामुद्दीन के पास एक सर्टिफिकेट भी है जो आजाद हिंद फौज से उनका संबंध दिखाता है। इस सर्टिफिकेट से यह भी पता चलता है कि स्वामी का पूरा नाम एसवी स्वामी था और वह राहत और देश - प्रत्यावर्तन काउंसिल , पूर्व आजाद हिंद फौज और गठबंधन , रंगून के चेयरमैन थे। 1969 में निजामुद्दीन अपने परिवार के साथ भारत लौट आए।

ये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है
Source : Indiatimes

Saturday, July 9, 2011

सुखदेव का पत्र गाँधी के नाम

शहीद सुखदेव ने, मार्च 1931 में घृणित गाँधी-इर्विन समझौते के बाद, अपनी फ़ाँसी से तीन दिन पहले, एक खत लिखकर गाँधी से कुछ पूछा था, इस खत का जबाब गाँधी ने उन्हे और इस देश को कभी नही दिया । आखिर कब तक हम सब सोते रहेंगे ? अब नयी पीढी फ़िर से पूछेगी वो सारे प्रश्न जिन्हे गाँधी, नेहरू और उनकी अंग्रेज सरकार ने दबा दिया, कभी अपने जुल्मों से, कभी प्रेस पर पाबंदी लगाकर और कभी गाँधी के उपदेशों से भरमाकर ।
उसी पत्र के कुछ अंश प्रस्तुत हैं …
“समझौता करके आपने अपना आन्दोलन रोक लिया है, इसके परिणामस्वरूप सत्याग्रह के सारे कैदी रिहा हो गये हैं । पर क्रान्तिकारी बन्दियों के बारे मे आपका क्या कहना है ? 1915 के गदर पार्टी के कैदी आज भी जेलों में पडे सड रहें हैं, जबकि उनकी सजायें पूरी हो चुकी हैं । मार्शल ला के सैकडों कैदी आज भी जीवित होते कब्रों में दफ़नाये हुये हैं । इसी तरह बबर अकाली लहर के दर्जनों कैदी जेल की यातनायें सहन कर रहे हैं । आधी दर्जन से ज्यादा केस – लाहौर, दिल्ली, चटगांव, बम्बई कलकत्ता आदि स्थानों पर चल रहे हैं, अनेक क्रान्तिकारी शामिल हैं जिसमे औरतें भी हैं, कई कैदी अपनी मौत का इन्तजार कर रहे हैं । इन सबके बारे में आपको क्या कहना है ? …  ” – पंजाबी पत्रिका हेम ज्योति, मार्च 1971
शहीद सुखदेव ने स्पष्ट शब्दों मे गाँधी पर यह आरोप लगाया था –“आप क्रान्तिकारी आन्दोलन को कुचलने में नौकरशाही का साथ दे रहे हैं ।”
शहीद का यह आरोप कितना सच है और कितना झूठ ये आप सभी अच्छी तरह जान चुके हैं। गाँधी की इस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकत कहा तक न्यायसंगत है ? क्या जेलों मे पडे अन्य कैदी उनके देशवासी नही थे, क्या उनका उद्देश्य देश को आजादी दिलाना नही था, क्या उन्होने देश के लिये कुछ नही किया था, देश के लिये अब उनका कोइ महत्व नही रह गया था ? परन्तु गाँधी को तो इस बारे में कुछ सोचना ही नही था, उसे क्रान्तिकारियों के बढते प्रभाव का डर जो सता रहा था, उसे अपने चहेते लालची नेहरू को देश का कर्णधार जो बनाना था ।
जय हिन्द, जय स्वदेश ।

Sunday, July 3, 2011

नाथूराम गोडसे का आखिरी पत्र : Nathuram Godse's last letter

प्रिय बन्धो चि. दत्तात्रय वि. गोडसे
              मेरे बीमा के रूपिया आ जायेंगे तो उस रूपिया का विनियोग अपने परिवार के लिए करना । रूपिया 2000 आपके पत्नी के नाम पर , रूपिया 3000 चि. गोपाल की धर्मपत्नी के नाम पर और रूपिया 2000 आपके नाम पर । इस तरह से बीमा के कागजों पर मैंने रूपिया मेरी मृत्यु के बाद मिलने के लिए लिखा है ।
              मेरी उत्तरक्रिया करने का अधिकार अगर आपकों मिलेगा तो आप अपनी इच्छा से किसी तरह से भी उस कार्य को सम्पन्न करना । लेकिन मेरी एक ही विशेष इच्छा यही लिखता हूँ ।
              अपने भारतवर्ष की सीमा रेखा सिंधु नदी है जिसके किनारों पर वेदों की रचना प्राचीन द्रष्टाओं ने की है ।
वह सिंधुनदी जिस शुभ दिन में फिर भारतवर्ष के ध्वज की छाया में स्वच्छंदता से बहती रहेगी उन दिनों में मेरी अस्थि या रक्षा का कुछ छोटा सा हिस्सा उस सिंधु नदी में बहा दिया जाएँ । मेरी यह इच्छा सत्यसृष्टि में आने के लिए शायद ओर भी एक दो पीढियों ( Generations ) का समय लग जाय तो भी चिन्ता नहीं । उस दिन तक वह अवशेष वैसे ही रखो । और आपके जीवन में वह शुभ दिन न आया तो आपके वारिशों को ये मेरी अन्तिम इच्छा बतलाते जाना । अगर मेरा न्यायालीन वक्तव्य को सरकार कभी बन्धमुक्त करेगी तो उसके प्रकाशन का अधिकार भी मैं आपको दे रहा हूँ ।
              मैंने 101 रूपिया आपकों आज दिये है जो आप सौराष्ट्र सोमनाथ मन्दिर पुनरोद्धार हो रहा है उसके कलश के कार्य के लिए भेज देना ।
              वास्तव में मेरे जीवन का अन्त उसी समय हो गया था जब मैंने गांधी पर गोली चलायी थी । उसके पश्चात मानो मैं समाधि में हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ । मैं मानता हूँ कि गांधी जी ने देश के लिए बहुत कष्ट उठाएँ , जिसके लिए मैं उनकी सेवा के प्रति और उनके प्रति नतमस्तक हूँ , किन्तु देश के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि का विभाजन करने का अधिकार नहीं था ।
              मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता और नहीं चाहता हूँ कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करें । अपने देश के प्रति भक्ति-भाव रखना अगर पाप है तो मैं स्वीकार करता हूँ कि वह पाप मैंने किया है । अगर वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पर मेरा नम्र अधिकार है । मुझे विश्वास है की मनुष्यों के द्वारा स्थापित न्यायालय से ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे कार्य को अपराध नहीं समझा जायेगा । मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह कार्य किया है । मैंने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीतियों के कारण हिन्दुओं पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए । मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा कार्य ' नीति की दृष्टि ' से पूर्णतया उचित है । मुझे इस बात में लेशमात्र भी सन्देह नहीं की भविष्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेंगे तो वे मेरे कार्य को उचित ठहराएंगे ।
                 कुरूक्षेत्र और पानीपत की पावन भूमि से चलकर आने वाली हवा में अन्तिम श्वास लेता हूँ । पंजाब गुरू गोविंद की कर्मभूमि है । भगत सिंह , राजगुरू और सुखदेव यहाँ बलिदान हुए । लाला हरदयाल तथा भाई परमानंद इन त्यागमूर्तियों को इसी प्रांत ने जन्म दिया ।
                 उसी पंजाब की पवित्र भूमि पर मैं अपना शरीर रखता हूँ । मुझे इस बात का संतोष है । खण्डित भारत का अखण्ड भारत होगा उसी दिन खण्डित पंजाब का भी पहले जैसा पूर्ण पंजाब होगा । यह शीघ्र हो यही अंतिम इच्छा !

आपका
नाथूराम वि. गोडसे







Tuesday, May 10, 2011

Nathuram Godse's last speech in court: Parts



These are few parts of that speech given by of Nathuran Godse in the court:

          “All my readings and thinking led me to believe it was my first duty to serve Hinduism and Hindus both as a patriot and as a world citizen. To secure the freedom and to safeguard the just interests of some thirty crores (300 million) of Hindus would automatically constitute the freedom and the well being of all India, one fifth of human race. This conviction led me naturally to devote myself to the Hindu Sanghtanist ideology and program, which alone, I came to believe, could win and preserve the national independence of Hindustan, my Motherland, and enable her to render true service to humanity as well.

Nathuram Godse
           Since the year 1920, that is, after the demise of Lokamanya Tilak, Gandhiji’s influence in the Congress first increased and then became supreme. His activities for public awakening were phenomenal in their intensity and were reinforced by the slogan of truth and non-violence, which he paraded ostentatiously before the country. No sensible or enlightened person could object to those slogans. In fact there is nothing new or original in them. They are implicit in every constitutional public movement. But it is nothing but a mere dream if you imagine that the bulk of mankind is, or can ever become, capable of scrupulous adherence to these lofty principles in its normal life from day to day. In fact, honor, duty and love of one’s own kith and kin and country might often compel us to disregard non-violence and to use force. I could never conceive that an armed resistance to an aggression is unjust. I would consider it a religious and moral duty to resist and, if possible, to overpower such an enemy by use of force. [In the Ramayana] Rama killed Ravana in a tumultuous fight and relieved Sita. [In the Mahabharata], Krishna killed Kansa to end his wickedness; and Arjuna had to fight and slay quite a number of his friends and relations including the revered Bhishma because the latter was on the side of the aggressor. It is my firm belief that in dubbing Rama, Krishna and Arjuna as guilty of violence, the Mahatma betrayed a total ignorance of the springs of human action.

            In more recent history, it was the heroic fight put up by Chhatrapati Shivaji that first checked and eventually destroyed the Muslim tyranny in India. It was absolutely essentially for Shivaji to overpower and kill an aggressive Afzal Khan, failing which he would have lost his own life. In condemning history’s towering warriors like Shivaji, Rana Pratap and Guru Gobind Singh as misguided patriots, Gandhiji has merely exposed his self-conceit. He was, paradoxical, as it may appear a violent pacifist who brought untold calamities on the country in the name of truth and non-violence, while Rana Pratap, Shivaji and the Guru will remain enshrined in the hearts of their countrymen forever for the freedom they brought to them.

             The accumulating provocation of thirty-two years, culminating in his last pro-Muslim fast, at last goaded me to the conclusion that the existence of Gandhi should be brought to an end immediately. Gandhi had done very well in South Africa to uphold the rights and well being of the Indian community there. But when he finally returned to India he developed a subjective mentality under which he alone was to be the final judge of what was right or wrong. If the country wanted his leadership, it had to accept his infallibility; if it did not, he would stand aloof from the Congress and carry on his own way. Against such an attitude there can be no halfway house. Either Congress had to surrender its will to his and had to be content with playing second fiddle to all his eccentricity, whimsicality, metaphysics and primitive vision, or it had to carry on without him. He alone was the Judge of everyone and everything; he was the master brain guiding the civil disobedience movement; no other could know the technique of that movement. He alone knew when to begin and when to withdraw it. The movement might succeed or fail, it might bring untold disaster and political reverses but that could make no difference to the Mahatma’s infallibility. ‘A Satyagrahi can never fail’ was his formula for declaring his own infallibility and nobody except himself knew what a Satyagrahi is.

            The Congress, which had boasted of its nationalism and socialism, secretly accepted Pakistan literally at the point of the bayonet and abjectly surrendered to Jinnah. India was vivisected and one-third of the Indian Territory became foreign land to us from August 15, 1947. This is what Gandhi had achieved after thirty years of undisputed dictatorship and this is what Congress party calls ‘freedom’ and ‘peaceful transfer of power’. The Hindu-Muslim unity bubble was finally burst and a theocratic state was established with the consent of Nehru and his crowd and they have called ‘freedom won by them with sacrifice’ – whose sacrifice? When top leaders of Congress, with the consent of Gandhi, divided and tore the country – which we consider a deity of worship – my mind was filled with direful anger.

            One of the conditions imposed by Gandhi for his breaking of the fast unto death related to the mosques in Delhi occupied by the Hindu refugees. But when Hindus in Pakistan were subjected to violent attacks he did not so much as utter a single word to protest and censure the Pakistan Government or the Muslims concerned. Gandhi was shrewd enough to know that while undertaking a fast unto death, had he imposed for its break some condition on the Muslims in Pakistan, there would have been found hardly any Muslims who could have shown some grief if the fast had ended in his death. It was for this reason that he purposely avoided imposing any condition on the Muslims. He was fully aware of from the experience that Jinnah was not at all perturbed or influenced by his fast and the Muslim League hardly attached any value to the inner voice of Gandhi.

             Gandhi is being referred to as the Father of the Nation. But if that is so, he had failed his paternal duty inasmuch as he has acted very treacherously to the nation by his consenting to the partitioning of it. I stoutly maintain that Gandhi has failed in his duty. He has proved to be the Father of Pakistan. His inner-voice, his spiritual power and his doctrine of non-violence of which so much is made of, all crumbled before Jinnah’s iron will and proved to be powerless.

             I do say that my shots were fired at the person whose policy and action had brought rack and ruin and destruction to millions of Hindus. There was no legal machinery by which such an offender could be brought to book and for this reason I fired those fatal shots.

             I now stand before the court to accept the full share of my responsibility for what I have done and the judge would, of course, pass against me such orders of sentence as may be considered proper. But I would like to add that I do not desire any mercy to be shown to me, nor do I wish that anyone else should beg for mercy on my behalf. My confidence about the moral side of my action has not been shaken even by the criticism leveled against it on all sides. I have no doubt that honest writers of history will weigh my act and find the true value thereof some day in future.”

- NATHURAM GODSE

       You can find complete speech in the following blog: http://d-indians.blogspot.com/2011/04/nathuram-godses-last-speech-in-court.html

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