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Wednesday, November 30, 2016

Why congress wants to remove General V.K Singh?


All of us know that corrupt babus & politicians have penetrated the defense forces and we saw the result in Adarsh Scam and Sukna land Scam. In Any defense contract middlemen gets paid upto 15-20% of the deal, So with around $36 billion dollar defence budget arnd $5 billion dollar is grabbed by these middlemen. Who are the middlemen, mostty they are congressemen. Let us find out the reason for this kolaveri di ..?

1. General V.K singh was in charge of investigating the Land Scams and other corruption and he exposed the babu nexus in Army.

2. He started cleaning the army after becoming General and withheld lot of defense contracts marred in corruption giving sleepless nights to the ministry of defense.

3. He has even prepared a roadmap for future so that Defense forces can get the best deals without any corruption that ministry of defense hates.

4. He has also been offered a governors post by congress if he resigns. That he had already refused.

5. Last and the most important reason. He had sent a letter of support to Anna Hazare during his fast on 5th April.

And now congress wants to install a general who will be a puppet in the hands of congress just like our Mauni Baba. May be they are scared of General because he is a roadblock if the government wants to bring emergency in near future.

If you want to read in detail go thru this link - चौथी दुनिया से एक और सच

देश के सर्वोच्च न्यायालय में सेना और सरकार आमने-सामने हैं. आज़ादी के बाद भारतीय सेना की यह सबसे शर्मनाक परीक्षा हैजिसमें थल सेनाध्यक्ष की संस्था को सरकार दाग़दार कर रही है. पहली बार सेनाध्यक्ष और सरकार के बीच विवाद का फैसला अदालत में होगा. विवाद भी ऐसाजिसे सुनकर दुनिया भर में भारत की हंसी उड़ रही है. यह मामला थल सेनाध्यक्ष जनरल विजय कुमार सिंह की जन्मतिथि का है. इस मामले में एक पीआईएल सुप्रीम कोर्ट के सामने है. वहां क्या होगायह पता नहींलेकिन इस विवाद को लेकर जो भ्रम फैलाया जा रहा हैउसे समझना ज़रूरी है. सारे तथ्य और सबूत इस बात को साबित करते हैं कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1951 हैलेकिन सरकार ने इस तथ्य को ठुकरा दिया और उनकी जन्मतिथि 10 मई, 1950 मान ली. सरकार की इस ज़िद का राज़ क्या है. सरकार क्यों देश के सर्वोच्च सेनाधिकारी को बेइज़्ज़त करने पर तुली हैजबकि यह बात दिन के उजाले की तरह सा़फ है कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1951 है. साक्ष्य इतने पक्के हैं कि सुप्रीम कोर्ट के तीन-तीन भूतपूर्व चीफ जस्टिस ने अपनी राय जनरल वी के सिंह के पक्ष में दी है. इसके बावजूद अगर विवाद जारी है तो इसका मतलब है कि दाल में कुछ काला है.

1.  सरकार की नाराज़गी की कई वजहें हैं. भारतीय सेना एक ट्रक का इस्तेमाल करती हैजिसका नाम है टेट्रा ट्रक. भारतीय थलसेना टेट्रा ट्रक का इस्तेमाल मिसाइल लांचर की तैनाती और भारी-भरकम चीजों के ट्रांसपोर्टेशन में इस्तेमाल करती है. इन ट्रकों का पिछला ऑर्डर फरवरी, 2010 में दिया गया थालेकिन ख़रीद में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की शिकायतें सामने आईं तो आर्मी चीफ वी के सिंह ने इस सौदे पर मुहर लगाने से इंकार कर दिया.  भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड यानी बीईएमएल लिमिटेड को जिस व़क्त इन ट्रकों की आपूर्ति का ठेका मिलातब भारतीय सेना की कमान जनरल दीपक कपूर के हाथ में थी.

2. दरअसलबीईएमएल द्वारा टेट्रा ट्रकों की ख़रीद का पूरा मामला संदेह के घेरे में है. एक अंग्रेजी अख़बार डीएनए के मुताबिक़रक्षा मंत्रालय की ओर से अभी तक दिए गए कुल ठेकों में भारी धनराशि बतौर रिश्वत दी गई है. डीएनए के मुताबिक़यह पूरा रैकेट 1997 से चल रहा है. बीईएमएल में उच्च पद पर रह चुके एक पूर्व अधिकारी के हवाले से यह भी ख़बर आई कि अभी तक कंपनी टेट्रा ट्रकों की डील से जुड़ा कुल 5,000 करोड़ रुपये तक का कारोबार कर चुकी है. यह कारोबार टेट्रा सिपॉक्स (यूके) लिमिटेड के साथ किया गया है. इसे स्लोवाकिया की टेट्रा सिपॉक्स एएस की सब्सिडियरी बताया जाता रहा है. बीईएमएल के इस पूर्व अधिकारी के मुताबिक़, 5,000 करोड़ रुपये के इस कारोबार में 750 करोड़ रुपये बीईएमएल एवं रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को बतौर रिश्वत दिए गए.

3.  बीईएमएल के एक शेयरधारक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता के एस पेरियास्वामी राष्ट्रपति के हस्तक्षेप और सीबीआई जांच की मांग कर चुके हैं. वह कहते हैंख़रीद के लिए जितनी रकम की मंजूरी दी जाती हैउसका कम से कम 15 फीसदी हिस्सा कमीशन में चला जाता है. ऊपर से नीचे तक सबको हिस्सा मिलता है. मैंने 2002 में कंपनी की एजीएम में यह मुद्दा उठाया थालेकिन इस पर चर्चा नहीं की गई. एक प्रतिष्ठित बिजनेस अख़बार ने यहां तक लिखा कि बीईएमएल की टेट्रा ट्रकों की डील को कारगर बनाने में जुटी हथियार विक्रेताओं की लॉबी ने आर्मी चीफ को आठ करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश भी की थीजिसे जनरल वी के सिंह ने ठुकरा दिया.

 अब सवाल यह उठता है कि क्या आर्मी चीफ पर इसलिए पद छोड़ने का दबाव हैक्योंकि उन्होंने टेट्रा डील पर दस्तख़त नहीं किए थेक्या बीईएमएल सेकेंड हैंड ट्रकों का आयात कर रही है और क्या स्लोवाकिया में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद हो गया हैक्या पुराने ट्रकों की मरम्मत को घरेलू उत्पादन के तौर पर दिखाया जा रहा हैरविंदर ऋषि कौन हैउसे इतने रक्षा सौदों का ठेका क्यों दिया जा रहा हैइस लॉबी के लिए सरकार में काम करने वाले लोग कौन हैंअगर सरकार इन सवालों का जवाब नहीं देती है तो इसका मतलब यही है कि आर्मी चीफ को ठिकाने लगाने के लिए मा़िफया और अधिकारियों ने मिलजुल कर जन्मतिथि का बहाना बनाया है.

4. जनरल वी के सिंह ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए एक प्लान तैयार कियायह प्लान डिफेंस मिनिस्ट्री में लटका हुआ है. उन्होंने इस बीच कई ऐसे काम किएजिनसे आर्म्स डीलरों और बिचौलियों की नींद उड़ गई. सिंगापुर टेक्नोलॉजी से एक डील हुई थी. इस कंपनी की राइफल को टेस्ट किया गयाउसके बाद जनरल वी के सिंह ने रिपोर्ट दी कि यह राइफल भारत के लिए उपयुुक्त नहीं है. भारतीय सेना को नए और आधुनिक हथियारों की ज़रूरत है. इस ज़रूरत को देखते हुए वह अगले एक-दो सालों में भारी मात्रा में सैन्य शस्त्र और नए उपकरण ख़रीदने वाली है. ख़ासकरभारत इस साल भारी मात्रा में मॉडर्न असॉल्ट राइफलें ख़रीदने वाला है. भारत का सैन्य इतिहास यही बताता है कि आर्म्स डील के दौरान जमकर घूसखोरी और घपलेबाज़ी होती है. जनरल वी के सिंह सेना के अस्त्र-शस्त्रों की ख़रीददारी में पारदर्शिता लाना चाहते हैं. वह एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहते हैंजिसमें सैनिकों को दुनिया के सबसे आधुनिकतम हथियार मिलेंलेकिन कोई बिचौलिया न हो और न कहीं किसी को दलाली खाने का अवसर मिले

5. जबसे वह सेनाध्यक्ष बने हैंतबसे भारतीय सेना पर कोई घोटाले या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा. भ्रष्टाचार के जो पुराने मामले थेउन्हें न स़िर्फ निपटाया गयाबल्कि उन्होंने आदर्श जैसे घोटाले की जांच में एजेंसियों की मदद की. आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के ज़मीन घोटाले में जनरल वी के सिंह ने मुस्तैदी दिखाई. सेना की कोर्ट ऑफ इनक्वायरी का गठन कियाजिसमें दो पूर्व सेनाध्यक्षों-जनरल दीपक कपूर और जनरल एन सी विज सहित कई टॉप अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया. इन सबका नतीजा यह हुआ कि आर्म्स डीलरों की लॉबीअधिकारीज़मीन मा़िफया और ऐसे कई सारे लोग जनरल वी के सिंह के ख़िला़फ लामबंद हो गए और उनकी जन्मतिथि के विवाद को हवा दी.

6. जबसे वह सेनाध्यक्ष बने हैंतबसे भारतीय सेना पर कोई घोटाले या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा. भ्रष्टाचार के जो पुराने मामले थेउन्हें न स़िर्फ निपटाया गयाबल्कि उन्होंने आदर्श जैसे घोटाले की जांच में एजेंसियों की मदद की. आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के ज़मीन घोटाले में जनरल वी के सिंह ने मुस्तैदी दिखाई. सेना की कोर्ट ऑफ इनक्वायरी का गठन कियाजिसमें दो पूर्व सेनाध्यक्षों-जनरल दीपक कपूर और जनरल एन सी विज सहित कई टॉप अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया. इन सबका नतीजा यह हुआ कि आर्म्स डीलरों की लॉबीअधिकारीज़मीन मा़िफया और ऐसे कई सारे लोग जनरल वी के सिंह के ख़िला़फ लामबंद हो गए और उनकी जन्मतिथि के विवाद को हवा दी.

7. उन्होंने सेना में मीट की सप्लाई करने वाले मीट कारटेल का स़फाया कर दियावे लोग जो मीट सप्लाई करते थेवह ठीक नहीं था. जनरल वी के सिंह ने इसके लिए ग्लोबल टेंडर की शुरुआत कीताकि दुनिया का सबसे बेहतर मीट सेना के जवानों को मिले.

8. सेनाध्यक्ष बनते ही उन्होंने सेना में मौजूद भ्रष्टाचार और मा़िफया तंत्र को ख़त्म करना शुरू कर दिया. लगता हैयह बात नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक में बैठे अधिकारियों को ख़राब लगी. देश में सरकारी तंत्र कैसे चल रहा हैयह एक स्कूली बच्चे को भी पता है. लगता हैदेश में जो ईमानदार और आदर्शवादी लोग हैंउनके लिए सरकारी तंत्र में कोई जगह नहीं रह गई है. उन्हें ईनाम मिलने की जगह सज़ा दी जाती है और जलील किया जाता है.

क्या इस देश में अलग-अलग नागरिकों के लिए अलग-अलग क़ानून हैं या फिर यह मान लिया जाए कि इस देश को मा़िफया सरगना और सरकार में बैठे उनके दलाल चला रहे हैं. पूरे देश की जनता एक ऐसे घिनौने वाक्ये से रूबरू हो रही हैजिसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पिछले सात सालों में जिस तरह देश में संवैधानिक और राजनीतिक संस्थानों की बर्बादी हुई हैवैसी पहले कभी नहीं हुई. हैरानी की बात यह है कि सरकार एक तऱफ यह कह रही है कि थल सेनाध्यक्ष झूठ बोल रहे हैं और दूसरी तऱफ वह उनसे डील भी करती है कि उन्हें किसी देश का राजदूत या किसी राज्य का गवर्नर बना दिया जाएगा. यही नहींयह धमकी भी दी जा रही है कि अगर वह कोर्ट गए तो उन्हें सेनाध्यक्ष के पद से ब़र्खास्त कर दिया जाएगा.

इसलिए जनरल वी के सिंह को ख़ुद के लिए नहींबल्कि इस संस्था की गरिमा बचाने के लिए कोर्ट में जाना चाहिए. अगर वह नहीं गए तो इसका मतलब यही है कि देश के माफियाअधिकारी और नेता जब चाहेंगिरोह बनाकर भविष्य के सेनाध्यक्षों को नीचा दिखा सकते हैंउन्हें मनचाहा काम कराने के लिए मजबूर कर सकते हैं. जनरल वी के सिंह लड़ रहे हैंयह अच्छी बात है. हो सकता हैभविष्य में किसी दूसरे ईमानदार सेनाध्यक्ष के साथ फिर ऐसा होलेकिन वह जनरल वी के सिंह की तरह लड़ भी न सके.

Whistle Blower Protection Bill, 29 March 2012, अरविंद केजरीवाल



      लगता है इस काँग्रेस सरकार को और इस देश के सभी सांसदों को लगता है भारत एक हमेशा ही सोने वाले मूर्खों का देश है। हम कुछ लोग शर्म से ये सच स्वीकारते हैं और कुछ गर्व से। उदाहरण देखियेमूर्ख जनता के बुद्धिमान सांसदों का करतब -- 
अरविंद केजरीवाल के ही शब्दों में -- "29 मार्च 2012 को काँग्रेस पार्टी की भारत सरकार ने बिना चर्चा के कुछ ही मिनटों में दो बिल पास किए। उनमे से एक है Whistle Blower Protection Bill ये भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को संरक्षण देने की वजाय उनको ज्यादा प्रताड़ित करने के लिए बनाया गया है। अभी तक अगर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठता था तो वो कहीं जाके कम से कम शिकायत कर लेता था। उसके ऊपर फिर माफिया तरह तरह से उसे प्रताड़ित करते थे और कई बार तो उनकी हत्या कर दी जाती थी। इससे लोगों को संरक्षण देना तो दूरइस कानून मे लिखा है यदि कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करेगायदि उसकी शिकायत में पर्याप्त सबूत नहीं होंगे तो उसे दो साल के लिए जेल में डाल दिया जाएगा। तो ये भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सरक्षण देने के लिए बनाया है कि उनकी आवाज कुचलने के लिए बनाया है?

सरकार की नियत में खोट हैसरकार अच्छे बिल लाना ही नहीं चाहती। सरकार जो भी कदम उठा रही हैउससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है और दुख की बात ये है की संसद भी सरकार के ऐसे लाये हुये बिलों पर अपना ठप्पा लगा कर पास करती जा रही है।"





 बहुत संभव है कि कुछ दिनों में ये vedio या blog बंद हो जाए।

तथाकथित महात्मा के इस देश पर उपकार: तुष्टीकरण की शुरुआत



5 मार्च, 1931 को इर्विन के साथ अपने समझौते के क्षण से ही गांधी जी मुस्लिम प्रश्न का हल खोजने में जुट गये थे। उन दिनों बनारसकानपुरमिर्जापुर आदि अनेक नगरों में भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। कानपुर के मुसलमानों ने भगत सिंह की फांसी के विरोध में प्रदर्शन में शामिल होने से मना कर दियाजिससे दंगा भड़क उठा। हिन्दू मुस्लिम एकता के बड़े प्रचारक और कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी की एक मुस्लिम मुहल्ले में हत्या कर दी गयी। इस प्रक्षोभक वातावरण में गांधी जी की प्रेरणा से कराची के कांग्रेस अधिवेशन के अंत में 1 अप्रैल को कराची में ही जमीयत उल उलेमा का अधिवेशन रखा गयाजिसमें गांधी जी ने कानपुर के दंगों के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहरायाउसके लिए शर्मिंदगी प्रगट कीउनकी ओर से मुसलमानों से क्षमायाचना कीउलेमा से मुस्लिम समस्या को हल करने की प्रार्थना की गई। महादेव देसाई ने अपनी डायरी के 12वें खंड में गांधी जी के उस भाषण को विस्तार से दिया है। गांधी जी ने कहा, 'इस बारे में मैं उलेमा की कदमबोसी (चरण चूमकर) करके उनकी मदद चाहता हूं। अगर हम इसमें कामयाब नहीं हुए तो गोलमेज सम्मेलन में जाना लगभग बेकार-सा होगा। मैं नहीं चाहता कि यह हुकूमत पंच बनकर हमारी आपसी लड़ाई का फैसला करे। उलेमा से मैं नम्रता से कहूंगा कि वे इस बारे में बहुत कुछ मदद कर सकते हैं। कांग्रेस और हिन्दू की हैसियत से मैं कहता हूं कि मुसलमान जो चाहेंमैं देने को तैयार हूं। मैं बनियापन नहीं करना चाहता हूं कि आप जिस चीज की ख्वाहिश करते होंउसे एक कोरे कागज पर लिख दीजिए और मैं उसे कबूल कर लूंगा। जवाहर लाल ने भी जेल से यही बात कही थी।

वाह रे इंसाफवाह रे तुष्टीकरणगलत को गलत न कहना कायरता नहीं तो क्या हैनिरपराध को दोषी बताना स्वयम में एक अपराध नहीं तो क्या है? ... वाह रे गांधीत्ववाह रे महात्म्यवाह रे देश भक्त।

कौन राष्ट्रपिता? Kaun Rastrpita?


महान आर्यावर्त (भारत देश) का कोई सामान्य मनुष्य पिता भी हो सकता हैहम समझ नहीं सकते पर पढाया हमें यही गया था। कि कोई है जिसे हम राष्ट्रपिता कहते हैं जिसने स्वं ही अपने तथाकथित पुत्र के कई टुकड़े कर दिए तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का सहारा और मुस्लिम तुष्टीकरण की तलवार लेकर। लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जिस दिन इसी देश पर एक बालिका रानी लक्ष्मीबाई ने प्रश्नचिन्ह लगा दिया इस उपाधि पर ही।


एक छोटी बच्ची ने तीन मंत्रालयों को हिलाया --

राष्ट्रपिता से संबंधित जो आदेश कभी पारित ही नहीं हुआउसे तलाशता रहा पीएमओ

- गृह मंत्रालय और केंद्रीय अभिलेखागार ने भी छानी खाक 

लखनऊ, 3 अप्रैल (संवाद सूत्र) : जिज्ञासा उम्र की मोहताज नहीं होती। छोटी सी उम्र वाली ऐश्वर्या पराशर के मस्तिष्क में भी सवालों का ज्वार-भाटा जोर मारता रहता है। हद तो तब हो गई जब उसके सवालों का जवाब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ)गृह मंत्रालय और केंद्रीय अभिलेखागार, तीनों नहीं दे सके। 'सूचना का अधिकार अधिनियम-2005' (आरटीआइ) के अंतर्गत उसने 'भारत सरकार के उस आदेश की छायाप्रति मांगीजिसके अनुसार महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित किया गया हो'


दरअसल बात यह है कि महात्मा गांधी किसी आदेश के तहत 'राष्ट्रपिताघोषित नहीं हुए थे। पहली बार नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें रेडियो सिंगापुर पर छह जुलाई 1944 को दिए भाषण में राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया। इसके बाद सरोजनी नायडू और पं. जवाहर लाल नेहरू ने भी अपने संबोधनों में बापू को 'राष्ट्रपिताकहकर संबोधित किया। इन नेताओं द्वारा बापू को दी गई यह उपाधि जनसामान्य ने स्वीकार की। जब गांधी जी भारत सरकार के किसी आदेश द्वारा राष्ट्रपिता नहीं बने तो आदेश की छायाप्रति तो मिलनी ही नहीं थी और न ही मिली। सूचना से संबंधित जानकारी के लिए प्रधानमंत्री कार्यालयगृह मंत्रालय और केंद्रीय अभिलेखागार तीनों लगे रहे पर जिम्मेदारों को समझ में नहीं आया कि जवाब क्या दिया जाए। उन्होंने उत्तर दिया कि इस प्रकार के किसी कागज की छायाप्रति मौजूद नहीं है। वे यह नहीं कह सके कि इस प्रकार का आदेश कभी पारित ही नहीं हुआ। ऐसा कहते भी तब नजबकि उन्हें खुद जानकारी होती। इस अंधी दौड़ में गृह मंत्रालयपीएमओ और केंद्रीय अभिलेखागार की तो फजीहत हुई हीसाथ ही इस देश के इतिहास के विषय में उनकी जानकारी की भी पोल खुल गई। ऐसा तब है जबगांधी नाम जपते हुए चलने वाली कांग्रेस की सरकार ही केंद्र में है।


ऐसा नहीं है कि ऐश्वर्या की आरटीआइ पर विभाग पहली बार बगले झांक रहा हो। इससे पहले भी 2009 में उसने आरटीआइ का प्रयोग किया था। उस समय उसने मुख्यमंत्री कार्यालय में आरटीआइ के माध्यम से पूछा था कि विद्यालय के आसपास जमा गंदगी से यदि कोई विद्यार्थी बीमार हो जाता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगाइसका कोई जवाब नहीं मिलाहालांकि विद्यालय के आसपास की जमीन पर कूड़ा न डालने के निर्देश दिए गए और वह जमीन विद्यालय के सिपुर्द कर दी गई। अब उस जमीन पर विद्यालय द्वारा बनाया गया एक पुस्तकालय है।


किताब ने किया था प्रेरित: कक्षा छह की छात्रा ऐश्वर्या बताती हैं कि वह इतिहास की किताब में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का पाठ पढ़ रही थीं। उसमें महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया गया था। जिज्ञासा हुई कि कैसे वह राष्ट्रपिता बनेमाता-पिता से पूछ गया तो उनके पास जवाब नहीं था। विद्यालय से भी उत्तर नहीं मिला। ऐसे में आरटीआइ डालने का सुझाव उनकी मां ने दियाजो खुद आरटीआइ एक्टिविस्ट हैं।


पॉलीथिन मुक्त हो देश: दस वर्षीय ऐश्वर्या की तमन्ना है कि देश पॉलीथिन मुक्त हो। अभी वह अपनी परीक्षाओं में व्यस्त हैं। बाद में देशवासियों से पॉलीथिन प्रयोग न करने की अपील कर एक अभियान छेड़ने की तैयारी में हैं। ऐश्वर्या बताती हैं कि उनको गणित विषय सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। इसके अतिरिक्त खाली समय में वह अपने भाइयों राज (3) व यश (1) के साथ खेलती हैं। नाचना और गाना उनका शौक है। हालांकि वह कहीं भी इसकी विधिवत शिक्षा नहीं ले रही हैं।

Sunday, October 13, 2013

राम प्रसाद बिस्मिल और जवाहर लाल नेहरू: काकोरी लूट का मुकदमा


काकोरी कांड : ९ अगस्त १९२५ को काकोरी के पास महान क्रन्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में कुछ क्रांतिकारियों ने ८ डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर रोककर सरकारी खजाना लूट लिया।

 

२६ सितम्बर १९२५ तक ब्रिटिश पुलिस ने समूचे देश में ४० लोग गिरफ्तार किये, उन पर मुकदमा चलाया गया और पूरे डेढ़ साल तक लखनऊ हजरतगंज चौराहे पर बड़े डाकघर के पास स्थित रिकथियेटर नाम के सिनेमाघर को अदालत बनाकर उसमें काकोरी कांड के मुक़दमे का तांडव खेला गया।

इसमें रामप्रसाद बिस्मिल समेत चार लोगों, ठाकुर रोशन सिंह, अश्फाक उल्ला खां व राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी तथा अन्य १६ को आजीवन कारावास से लेकर कम से कम ५ बर्ष की सजाओं का आदेश दिया गया।

 

ये तो थी कहानी, अब कुछ तथ्य और --

 

अंग्रेज सरकार की ओर से १० लाख रुपये पानी की तरह बहाए गए और सरकारी वकील की हैसियत से पंडित जगत नारायण मुल्ला को ५०० रुपये रोज के मेहनताने पर रखा गया (याद रहे मुकदमा डेढ़ साल चला), और ये वही व्यक्ति था जो मैनपुरी षड्यंत्र में भी सरकारी वकील रह चुका था और पंडित जवाहरलाल नेहरु का साला था।

 

बिस्मिल ने ३० बर्ष और ६ महीने की आयु पायी। कैसी विडम्बना है कि चीन में रामप्रसाद बिस्मिल को लोग ज्यादा जानते हैं। लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में उनका चित्र मिलेगा पर हिन्दुस्तान में शायद नहीं।

 

अब तो जागो अब काले अंग्रेजों से मुक्त भारत बनाओ, अब तो गद्दारों को हटाओं, कब तक इन्हें अपना खून पिलाकर पालोगे।

 

बिस्मिल ने एक शेर अपने बारे में कहा था --
 

खुश्बू-ए-वतन, जब भी इधर घूम के निकले,

कहिएगा मेरे नक्शेकदम चूम के निकले,

बिस्मिल का नहीं, हिंद पाक़ीज जमीं के,

आशिक का जनाजा है, जरा धूम से निकले।

पत्रिका संस्कारम से, अंक मार्च २०१३
 

Wednesday, August 28, 2013

कहाँ गया आपातकाल में खोदा गया जयपुर के राजघराने का खजाना?



अक्सर सुनने को मिलता है कि आपातकाल में भारत सरकार ने जयपुर के पूर्व राजघराने पर छापे मारकर उनका खजाना जब्त किया था, राजस्थान में यह खबर आम है कि - चूँकि जयपुर की महारानी गायत्री देवी कांग्रेस व इंदिरा गांधी की विरोधी थी अत: आपातकाल में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयपुर राजपरिवार के सभी परिसरों पर छापे की कार्यवाही करवाई, जिनमें जयगढ़ का किला प्रमुख था, कहते कि राजा मानसिंह की अकबर के साथ संधि थी कि राजा मानसिंह अकबर के सेनापति के रूप में जहाँ कहीं आक्रमण कर जीत हासिल करेंगे उस राज्य पर राज अकबर होगा और उस राज्य के खजाने में मिला धन राजा मानसिंह का होगा| इसी कहानी के अनुसार राजा मानसिंह ने अफगानिस्तान सहित कई राज्यों पर जीत हासिल कर वहां से ढेर सारा धन प्राप्त किया और उसे लाकर जयगढ़ के किले में रखा, कालांतर में इस अकूत खजाने को किले में गाड़ दिया गया जिसे इंदिरा गाँधी ने आपातकाल में सेना की मदद लेकर खुदाई कर गड़ा खजाना निकलवा लिया|

यही आज से कुछ वर्ष पहले डिस्कवरी चैनल पर जयपुर की पूर्व महारानी गायत्री देवी पर एक टेलीफिल्म देखी थी उसमें में गायत्री देवी द्वारा इस सरकारी छापेमारी का जिक्र था साथ ही फिल्म में तत्कालीन जयगढ़ किले के किलेदार को भी फिल्म में उस छापेमारी की चर्चा करते हुए दिखाया गया| जिससे यह तो साफ़ है कि जयगढ़ के किले के साथ राजपरिवार के आवासीय परिसरों पर छापेमारी की गयी थी|

जश्रुतियों के अनुसार उस वक्त जयपुर दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग सील कर सेना के ट्रकों में भरकर खजाने से निकाला धन दिल्ली ले जाया गया, लेकिन अधिकारिक तौर पर किसी को नहीं पता कि इस कार्यवाही में सरकार के कौन कौन से विभाग शामिल थे और किले से खुदाई कर जब्त किया गया धन कहाँ ले जाया गया|

चूँकि राजा मानसिंह के इन सैनिक अभियानों व इस धन को संग्रह करने में हमारे भी कई पूर्वजों का खून बहा था, साथ ही तत्कालीन राज्य की आम जनता का भी खून पसीना बहा था| इस धन को भारत सरकार ने जब्त कर राजपरिवार से छीन लिया इसका हमें कोई दुःख नहीं, कोई दर्द नहीं, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि यह जनता के खून पसीने का धन था जो सरकारी खजाने में चला गया और आगे देश की जनता के विकास में काम आयेगा| पर चूँकि अधिकारिक तौर पर यह किसी को पता नहीं कि यह धन कितना था और अब कहाँ है ?

इसी जिज्ञासा को दूर करने व जनहित में आम जनता को इस धन के बारे जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पिछले माह मैंने एक RTI के माध्यम से गृह मंत्रालय से उपरोक्त खजाने से संबंधित निम्न सवाल पूछ सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत जबाब मांगे -

1- क्या आपातकाल के दौरान केन्द्रीय सरकार द्वारा जयपुर रियासत के किलों, महलों पर छापामार कर सेना द्वारा खुदाई कर रियासत कालीन खजाना निकाला गया था ? यही हाँ तो यह खजाना इस समय कहाँ पर रखा गया है ?

2- क्या उपरोक्त जब्त किये गए खजाने का कोई हिसाब भी रखा गया है ? और क्या इसका मूल्यांकन किया गया था ? यदि मूल्यांकन किया गया था तो उपरोक्त खजाने में कितना क्या क्या था और है ?

3- उपरोक्त जब्त खजाने की जब्त सम्पत्ति की यह जानकारी सरकार के किस किस विभाग को है?

4- इस समय उस खजाने से जब्त की गयी सम्पत्ति पर किस संवैधानिक संस्था का या सरकारी विभाग का अधिकार है?

5- वर्तमान में जब्त की गयी उपरोक्त संपत्ति को संभालकर रखने की जिम्मेदारी किस संवैधानिक संस्था के पास है?

6- उस संवैधानिक संस्था या विभाग का का शीर्ष अधिकारी कौन है?

7- खजाने की खुदाई कर इसे इकठ्ठा करने के लिए किन किन संवैधानिक संस्थाओ को शामिल किया गया और ये सब कार्य किसके आदेश पर हुआ ?

8- इस संबंध में भारत सरकार के किन किन जिम्मेदार तत्कालीन जन सेवकों से राय ली गयी थी?

मेरे उपरोक्त प्रश्नों की RTI गृह मंत्रालय ने सूचना उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार, जन पथ, नई दिल्ली के निदेशक को भेजी, जहाँ से मुझे जबाब आया कि –आप द्वारा मांगी गयी सूचना राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध नहीं है| साथ इस विभाग ने कार्मिक प्रशिक्षण विभाग द्वारा दिए गये दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए लिखा कि प्राधिकरण में उपलब्ध सामग्री ही उपलब्ध कराई जा सकती है किसी आवेदक को कोई सूचना देने के लिए अनुसंधान कार्य नहीं किया जा सकता|

जबकि मैंने अपने प्रश्नों में ऐसी कोई जानकारी नहीं मांगी जिसमें किसी अनुसंधान की जरुरत हो, लेकिन जिस तरह सरकार द्वारा सूचना मुहैया कराने के मामले में हाथ खड़े किये गये है उससे यह शक गहरा गया कि उस वक्त जयपुर राजघराने से जब्त खजाना देश के खजाने में जमा ही नहीं हुआ, यदि थोड़ा बहुत भी जमा होता तो कहीं तो कोई प्रविष्ठी मिलती या इस कार्यवाही का कोई रिकोर्ड होता| पर किसी तरह का कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं होना दर्शाता है कि आपातकाल में उपरोक्त खजाना तत्कालीन शासकों के निजी खजानों में गया है| और सीधा शक जाहिर कर रहा कि उपरोक्त खोदा गया अकूत खजाना आपातकाल की आड़ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने खुर्द बुर्द कर स्विस बैंकों में भेज दिया जिसे सीधे सीधे जनता के धन पर डाका है|

साथ ही यह प्रश्न भी समझ से परे है कि इस संबंध में क्या जानकारी सिर्फ राष्ट्रीय अभिलेखागार में ही हो सकती है ? किसी अन्य विभागों यथा आयकर आदि के पास नहीं हो सकती ? जबकि गृह मंत्रालय ने मेरी RTI का जबाब देने को सिर्फ राष्ट्रीय अभिलेखागार को ही लिखा|

आप के पास इस संबंध में कोई जानकारी हो, किसी अख़बार की उस वक्त छपी न्यूज की प्रति हो कृपया मेरे साथ साँझा करें | साथ ही आरटीआई कार्यकर्त्ता इस संबंध में मार्गदर्शन करें कि यह जानकारी प्राप्त करने के लिए किन किन विभागों में आरटीआई लगायी जाय तथा पहले लगायी आरटीआई की अपील कैसे व कहाँ की जाय, आपकी सुविधा के लिए आरटीआई व उसके जबाब की प्रतियाँ निम्न लिंक पर उपलब्ध है|

RTI Copy :--

RTI Reply :--
 

Sunday, June 30, 2013

क्‍या आप इशरत जहां व उसके साथियों की सच्‍चाई जानते हैं? Who is Ishrat Jahan

मुसलमान वोट पाने और अपने घोर विरोधी व गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए केंद्र सरकार जिस तरह से मजहबी आतंकवादियों की पैरोकार बनी हुई है, वह इस देश के लिए बेहद घातक है। केंद्र सरकार की संचालक कांग्रेस ने अपने पिट्ठू मीडिया हाउसों व बुद्धिजीवियों को भी इसका ठेका दे दिया है कि वह लगातार झूठ बोल-बोल कर इशरत जहां को 'संत इशरत' और इंटेलिजेंस ब्‍यूरो(IB) व गुजरात पुलिस को हैवान साबित करे, भले ही इससे देश की सुरक्षा दांव पर लगती हो! कट्टरपंथी मुसलमानों को भी यह रास आ रहा है....आखिर यह इस्‍लामी आतंकवाद को सरकारी स्‍वीकार्यता जो प्रदान करता है! 

 
 
चलिए छोडि़ए, जरा उस इशरत जहां की पृष्‍ठभूमि पर गौर फरमा लें, जिसकी जिंदगी यूपीए सरकार, कांग्रेस पार्टी, तहलका व एनडीटीवी जैसे मीडिया हाउसों, सरकारी व अरब के फंड पर पलने वाले पालतू एनजीओ और अपने दिमाग को बेचकर पैसा कमाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों लिए 'अनमोल' बन चुकी है! 
1) गुजरात पुलिस के क्राइम ब्रांच ने 15 जून 2004 को एक मुठभेड़ में चार लोगों को मार गिराया था, जिनके नाम हैं- जीशन जौहर उर्फ अब्‍दुल गनी, अहमद अली उर्फ सलीम, जावेद गुलाम शेख उर्फ प्रनेश कुमार पिल्‍लई और इशरत जहां। आरोप है कि गुजरात पुलिस ने इन चारों को फर्जी मुठभेड़ में मारा था। वहीं गुजरात पुलिस का पक्ष था कि उन्‍हें आईबी से यह सूचना मिली थी कि ये चारों लश्‍कर-ए-तैयबा के आतंकी हैं और गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने आए थे। इसके अलावा ये लोग गुजरात में जगह-जगह आतंकी हमले को अंजाम देना चाहते थे।
2) बाद में मारे गए व्‍यक्तियों में दो- जीशन जौहर व अहमद अली की पहचान पाकिस्‍तानी नागरिक के रूप में हुई।
3) जीशन जौहर पाक अधिकृत कश्‍मीर से जम्‍मू-कश्‍मीर में घुसा था। वहीं, अमजद अली को लश्‍कर-ए-तैयबा ने गुजरात व महाराष्‍ट्र में आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए सीधे पाकिस्‍तान से भारत के बॉर्डर में भेजा था।
4) तीसरा व्‍यक्ति जावेद उर्फ पिल्‍लई दुबई गया था, जहां लश्‍कर के प्रभाव में आकर उसने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया था और वह मुसलमान बन गया था।
5) लश्‍कर के इशारे पर जावेद व इशरत पति-पत्‍नी बनकर इत्र कारोबारी के रूप में भारत के अंदर भ्रमण करते थे ताकि किसी को उन पर शक न हो। दोनों ने साथ-साथ अहमदाबाद, लखनऊ व फैजाबाद जा कर महत्‍वपूर्ण स्‍थलों की रेकी की थी।
6) जो कांग्रेस संचालित यूपीए सरकार इशरत जहां को 'संत इशरत' साबित करने के लिए उसके फर्जी मुठभेड़ की थ्‍योरी गढ़ रही है, उसी केंद्र सरकार ने गुजरात हाईकोर्ट में यह हलफनामा दाखिल कर कहा था कि जावेद व इशरत आतंकवादी संगठन लश्‍कर-ए-तैयबा के सदस्‍य हैं।
7) 15 जून 2004 को इशरत सहित मुठभेड़ में चारों आतंकी मारे गए थे। उसके अगले ही दिन पाकिस्‍तान के लाहौर से प्रकाशित लश्‍कर-ए-तैयबा के मुख पत्र ' गजवा टाइम्‍स' ने मारे गए आतंकियों को शहीद करार देते हुए लिखा था कि भारतीय पुलिस ने लश्‍कर के चार सदस्‍यों को मार दिया। इसमें इशरत जहां का नाम भी शामिल था।
8) 24/11 को मुंबई हमले के मास्‍टर माइंड हेविड हेडली से पूछताछ के दौरान अमेरिका के एफबीआई को जो सूचना मिली थी, उसने उसे भारत सरकार से साझा किया था। अमेरिका द्वारा भारत सरकार को भेजे गए औपचारिक पत्र में लिखा था कि ' इशरत जहां आत्‍मघाती दस्‍ते की महिला सदस्‍य थी, जिसे लश्‍कर ने भर्ती किया था।' एफबीआई ने उस पत्र में लिखा था कि इस दस्‍ते की योजना गुजरात के सोमनाथ व अक्षरधाम मंदिर व महाराष्‍ट्र के सिद्धि विनायक मंदिर पर हमला करने की थी।
9) शुरू में केंद्रीय गृहमंत्रालय ने गुजरात पुलिस द्वारा मुठभेड़ के बाद पेश किए गए साक्ष्‍यों को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट में एक हलफनामा दिया था, जिसमें स्‍पष्‍ट तौर पर इशरत जहां को लश्‍कर का आतंकी बताया गया था। बाद में राजनीति करते हुए केंद्र सरकार पलट गई और इसे दूसरा ही रूप दे दिया।
10) आज आईबी यानी खुफिया विभाग के तत्‍कालीन संयुक्‍त निदेशक राजेंद्र कुमार को सीबीआई गिरफ्तार करने में जुटी है। सीबीआई का तर्क है कि राजेंद्र कुमार ने गलत सूचना देकर इशरत को मरवाया। यह भी आरोप है कि वह गुजरात पुलिस की कस्‍टडी में मौजूद इशरत को देखने भी गए थे और मुठभेड़ की सारी साजिश को अंजाम दिया था।
जबकि सच यह है कि आईबी केवल सूचनाओं को मॉनिटरिंग करने और उन्‍हें संबद्ध पक्ष को देने वाली एजेंसी है न कि कार्रवाई करने वाली एजेंसी। इसलिए आईबी के अधिकारी द्वारा किसी को मारने का आदेश देने की बात ही गलत है। लेकिन कुछ भी कर सकने में सक्षम कांग्रेस पार्टी व उसकी सरकार इशरत जहां के मुठभेड़ को गलत साबित करने के लिए आईबी के विरुद्ध सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है जबकि दोनों ही केंद्रीय एजेंसियां हैं।
11) लोगों को शायद पता नहीं है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाली कांग्रेस व अरब फंडेड एनजीओ जमात के कहने पर इशरत की मां शमीमा कौसर ने केंद्र सरकार से यह मांग की थी कि इस मामले की जांच सीबीआई के अधिकारी सतीश वर्मा को दिया जाए। लश्‍कर के एक आत्‍मघाती महिला की मां के कहने पर किसी अधिकारी को पूरे मामले का जांच अधिकारी बनाया जाना ही केंद्र सरकार के प्रति संदेह पैदा करता है।
12) आईबी ने सीबीआई निदेशक को कहा है कि सीबीआई अधिकारी सतीश वर्मा व आईबी के तत्‍कालीन संयुक्‍त निदेशक राजेंद्र कुमार के बीच पुराने समय में बेहद कटु संबंध थे।
इसकी सूचना केंद्र सरकार को भी थी, लेकिन सरकार ने एक आरोपी आतंकी की मां की मांग पर अपनी के दो एजेंसियों की साख पर बट्टा लगा दिया।
13) हर तरफ फजीहत होता देख और आईबी के विरोध के बाद केंद्र सरकार ने उस जांच अधिकारी सतीश वर्मा को इस मामले की जांच से हटा दिया है, लेकिन तब तक आईबी व सीबीआई की फजीहत हो चुकी थी।
14) जिस आईबी के निदेशक का नाम इससे पहले कोई नहीं जानता था, आज एकमुश्‍त मुसलमान वोट के लिए यूपीए को दोबारा सत्‍ता में लाने की कांग्रेसी महत्‍वाकांक्षा में उनकी तस्‍वीर भी जनता के समक्ष आ चुकी है। इससे पहले केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने 'सोनिया जी के कारण ही एक मुसलमान को आईबी का निदेशक बनाया गया है'- जैसा घोर सांप्रदायिक बयान देकर आईबी निदेशक की पहचान पहले ही उजागर कर चुके हैं।
अब सवाल उठता है कि आखिर इस देश के राजनीतिज्ञ कब तक मुसलमानों को इंसान से अधिक एक वोट बैंक मानकर चलते रहेंगे? कब तक चरमपंथी मुसलमान राष्‍ट्र राज्‍य से अधिक इस्‍लामी राज्‍य की स्‍थापना के लिए निर्दोष लोगों को आतंक का शिकार बनाते रहेंगे? इस्‍लामी चरमपंथियों को 'संत' साबित करने की कोशिश आखिर कब तक चलती रहेगी? कब तक मानवाधिकार के नाम पर मीडिया-एनजीओ-बुद्धिजीवियों की जमात आतंकियों के पक्ष में और पुलिस-सेना के विरोध में खड़ी होती रहेगी? और कब तक इस देश के नागरिक इशरत जहां जैसों की पृष्‍ठभूमि को जानकर भी उसके नाम पर चलने वाली राजनीति को खामोश रहकर बर्दाश्‍त करते रहेंगे?....आखिर कब तक ये सब चलता रहेगा?....कब तक....?

-- Sandeep Dev
http://www.aadhiabadi.com/positive-interference/vichar-vimarsh/741-who-was-ishrat-jahan


Wednesday, March 13, 2013

जिम्मेदार कौन ?


इन सब के लिए कौन जिम्मेदार है..?

(1) राउरकेला और जमशेदपुर में 1964 के सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने 2000 हिंदुओ को मार डाला. सत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(2) बंगाल 1947 में सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने 5000 हिंदुओ मार डाला सत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(3) 1967 अगस्त रांची में सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने 200 हिंदुओ फिर मारा गया सत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस-कांग् -रेस

(4) 1969 अहमदाबाद में सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने 512 से अधिक हिंदुओ को मार डाला सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस

(5) 1970 महाराष्ट्र में भिवंडी सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने लगभग 80 हिंदु मारे गए सत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(6) अप्रैल 1979 में मुसलमानों ने जमशेदपुर में साम्प्रदायिक दंगों,में 126 हिंदुओ मार डाला, पश्चिम बंगाल 125 से अधिक हिंदु मारे गए सत्तारूढ़ पार्टी -CPIM

(7) अगस्त १९८० मुरादाबाद साम्प्रदायिक दंगों में लगभग मुसलमानों ने 2000 हिंदुओ को मार डाला सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस

(8) मई 1984 भिवंडी में साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने 146 हिंदुओ को मार डाला, – सत्तारूढ़ पार्टी – कांग्रेस


(9) अक्टूबर 1984 दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों ने 2733हिंदुओ को मार डाला सत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(10) अप्रैल 1985 में मुसलमानों ने अहमदाबाद में सांप्रदायिक दंगों में 3000 हिंदुओ को मारा गयासत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(11) जुलाई 1986 में मुसलमानों ने अहमदाबाद में सांप्रदायिक हिंसा 59 हिंदुओको मार डालासत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(12) अप्रैल मई 1987- 81 हिंदु मारे गए मेरठ, उत्तर प्रदेश में - सत्तारूढ़ पार्टी - कांग्रेस

(13) 1983 फ़रवरी असम में सांप्रदायिक हिंसा 2000 हिंदु को मार डाला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.

(14) कश्मीर हिन्दुओ से खाली हो गया उस का जिम्मेदार कौन है, कांग्रेस सत्ता में और इस का अलावा बहुत कांड है जो कांग्रेस ने किये है, इन को मीडिया क्यों नहीं रोता क्यों सिर्फ गुजरात दीखता है.

Friday, February 1, 2013

समझौता एक्सप्रेस बम धमाके का सच

अभी कुछ ही दिन पहले यहाँ साध्वी प्रज्ञा सिंह जी की एक चिट्ठी आप लोगो को दिखाई थी, ये बताने के लिए की उन्हें किस तरह समझौता एक्सप्रेस बम धमाके में फसाया गया। ये कुछ तथ्य और हाथ लगें हैं प्रस्तुत हैं –

United Nations Security Council says LeT and other islamic organizations were involved in Samjhaouta express bomb blast, then why Indian home minister saying its RSS and BJP or Hindu Terror links ??
Please see yourself and think over the dangerous design of Congress to destroy India from within.
Truth of Samjhauta Express Bomb Blast

अगर साध्वी प्रज्ञा अपराधी हैं तो उनके अपराध को सबके सम्मुख क्यों नहीं रखा जाता ? उन्हें इसकी सजा क्यों नहीं दी जाती ? उन पर केवल अत्याचार ही क्यों हो रहा है ?

Truth of Samjhauta Express Bomb Blast

उन्हें प्रताणित किया जा रहा है क्योंकि कांग्रेस की नपुंसक सरकार अपने तथाकथित सेक्युलर राजनीती और मत्रियों के बेसिरपैर के "भगवा आतंकवाद" सम्बन्धी बयानों को पुष्ट कर, भारत को तोड़ने की साजिश में लगी हुयी है। उन्हें भगवा वस्त्र पहनने का दंड मिल रहा है, एक हिन्दू होने का दंड मिल रहा है।

जागो भारत जागो, और जागने के लिए सच जानना बहुत जरुरी है। ये उसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उठाया गया कदम है। जय हिन्द।

लिखिए अपनी भाषा में