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Wednesday, November 30, 2016

पृथक मताधिकार और द्विराष्ट्रवाद के प्रथम प्रणेता: गांधी


मुस्लिम समाज की ओर से इस व्यापक विरोध से चिंतित होकर गांधी जी ने 9 से 11 जून, 1931 तक बम्बई में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के सामने प्रस्ताव रखा कि साम्प्रदायिक वैमनस्य की समस्या का कोई हल न निकल पाने के कारण अब मुझे लंदन जाने का विचार त्याग देना चाहिए। उन्हीं दिनों गांधी जी पंजाब के दौरे पर गए। वहां लुधियाना में गांधी जी के निवास पर 10-15 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई। मास्टर तारा सिंह की अध्यक्षता वाली सिख लीग ने बार-बार तार देकर गांधी जी को पंजाब बुलाया था। उसके अध्यक्ष मास्टर तारा सिंह से गांधी जी ने पूछा कि मुझे क्यों बुलाया। तारा सिंह ने कहा कि 'राष्ट्रीय स्तर पर आप जो करवाएं हम करने को तैयार हैं, पर आप तो मुसलमानों को सब कुछ देने की सलाह देते हैं। हम लोगों को यह सब मुसलमानों के कौमी दबाव के सामने झुकने जैसा लगता है, जो हम सहन नहीं कर सकते। साम्प्रदायिक दृष्टि से लिए गये इस निर्णय को हम स्वीकार नहीं कर सकते।' इसके उत्तर में गांधी जी ने कहा 'यदि एक पूरी कौम किसी वस्तु के बगैर संतुष्ट होने को तैयार न हो और हमें उनके साथ ही रहना हो तो उनकी बात मानकर ही तो उनको जीता जा सकता है न? दूसरा उपाय क्या है?' सिखों ने कहा, 'दूसरा उपाय यह है कि उनके समान दबाव डालकर वे जो भी मांगेंगे, वही हम भी मांगेंगे।' गांधी जी ने कहा, 'एक कौम को उसकी मांग के अनुसार दे देने में ही मैं राष्ट्र की एकता मानता हूं। आप राष्ट्रीय ध्वज के लिए भी आपत्ति करते हैं। आपको अपना रंग राष्ट्रीय ध्वज में चाहिए। आज का राष्ट्रीय ध्वज मेरी कल्पना के अनुरूप है। उस ध्वज में पूरे देश का त्याग सम्मिलित है। फिर भी एक कौम के संतोष के लिए, आपके लिए ही मैं उसे बदलने के लिए तैयार हुआ हूं, तो उसी प्रकार मुस्लिम कौम के लिए मैं आपको त्याग करने के लिए क्यों नहीं कह सकता? (महादेव देसाई की डायरी, खंड 12, पृ.253-254)
क्या सचमुच गांधी जी मानते थे कि मुसलमानों की पृथक मताधिकार की मांग मान लेने से भारत में राष्ट्रीय एकता स्थापित होगी? यदि ऐसा ही था तो कांग्रेस के नरमदलीय नेतृत्व ने भी 1909 के एक्ट में मुसलमानों को दिये गये पृथक मताधिकार के निर्णय को 1916 के लखनऊ समझौते तक स्वीकार क्यों नहीं किया? और 1916 में स्वीकार किया तो भी एक अल्पकालीन आपद् धर्म के रूप में? पृथक मताधिकार के विभाजनकारी दुष्परिणाम को ध्यान में रखकर लाला लाजपत राय ने 1924 नवम्बर- दिसंबर में अंग्रेजी दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित अपनी लम्बी लेखमाला में भविष्यवाणी की थी कि यदि पृथक मताधिकार बना रहा और मुस्लिम राजनीति का चरित्र वही रहा जो आज है, तो भारत का विभाजन अवश्यंभावी है। तभी उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी भारत में चार मुस्लिम राज्यों की स्थापना की चेतावनी दे दी थी। पर तब से अब तक भारतीय राजनीति का चरित्र बहुत बदल चुका था और लंदन पहुंचते ही गांधी जी ने यह कहना आरंभ कर दिया कि ऐतिहासिक कारणों से मैं मुसलमानों और सिखों के लिए पृथक मताधिकार देने को तैयार हूं। इसका अर्थ हुआ कि जाने या अनजाने उन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया।
औए ये स्वीकार कर गांधी ने भारत को दुर्दशा की ओर धकेलने के लिए पहला धक्का दिया।
Source: पांच्यजन्य

Tuesday, May 24, 2011

ग़ाँधी के सादे और संयमित भोजन का सच


   ग़ाँधी के आहार के प्रयोग बहुत मशहूर हैं ; पर बहुत कम लोग इसका सच जानते हैं । इस सिलसिले मे इंदुलाल याज्ञिक लिखते हैं –
    “मुझे तो उनके साथ जेल में रहने से पहले ही गाँधी जी के भोजन की मात्रा पर बडा विस्मय हुआ करता था । उदाहरण के लिये मैं यह देख आश्चर्यचकित रह जाता था कि जिन दिनों वह फ़लाहार करते थे उस समय वह अनगिनत केले और ढेर-सी मूँगफ़लियाँ खा डालते थे । नाडियाड मे किसान सत्याग्रह के अवसर पर मैं उन्हें इतनी रोटियाँ और इतनी बडी मात्रा मे दाल और चावल खाते देखता था कि मैं हैरान रह जाता था ।”
         नाडियाड , गुजरात के खेडा जिले का ही एक स्थान हैं जहाँ गाँधी ने अपने तथाकथित अंपग जीत के झंडे बुलन्द किए । आपने पढा ही है हमारे इस ब्लोग मे “अहमदाबाद आन्दोलन 1918” कि कैसे अहमदाबाद के किसान अन्न के दाने दाने को तरस रहे थे और गाँधी अपने उपदेश झाड रहे थे ।
एक पेटु ब्राह्मण की बात सुनाकर गाँधी ने खुद ही कहा था –
     “पर मुझे उस नादान ब्राह्मण पर हँसने का क्या अधिकार है, क्या मैं खुद खाने के मामले मे असंयम का अपराधी नहीं हूँ ? मैं खुद इतवार के व्रत की कसर पूरी करने के लिये अगली सुबह को दुगनी मात्रा मे खाना नहीं खा लेता ?” (गाँधीजी, पृ 211)
        ग़ाँधी का जीवन कभी भी सामान्य व्यक्तियों की तरह भी संयमित नही रहा, चाहे ये उसके बचपन का समय हो जब उसने अपने मित्र के साथ माँस खाने से भी परहेज नहीं किया, चाहे उसका युवाकाल जब वो विलायत मे वकालत की पढाई करने गया और मदिरा के साथ साथ स्त्रीसंग से यथायुक्ति विरक्ति नही कर पाया और चाहे खाने के सम्बन्ध मे उसका जीवन देख लीजिए जिसमे वह कभी भी अपनी जिव्हा को अपन नियंत्रण में नही कर पाया ।
        याज्ञिक जी गाँधी के साथ यरवदा जेल मे रहे थे, उन्होंने हमारे तथाकथित महात्मा के भोजन के बारे में असंयम की दिलचस्प घटनाएँ बयान की हैं । गाँधी ने खुद लिखा है –
     “उस वक्त मेरी खुराक खासतौर से थी मूँगफ़ली गुड मिलाकर, केले इत्यादि फ़ल और दो-तीन नींबुओं का रस । मैं जानता था कि मूँगफ़ली ज्यादा खाने से नुकसान करती है । फ़िर भी वह ज्यादा खाई गईं । इससे मामूली पेचिश हो गयी ।”
        इसी असंयमित जीवन का ही परिणाम था उसका गंदा स्वास्थ्य । ज़ीवन भर वो अपनी स्वादेंद्रिय की गुलामी करता रहा और इसी कारण से देश की पूर्ण स्वतंत्रता का स्वप्न भी कभी नही देख सका ।
     लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जिन्होने सर्वप्रथम पूर्ण स्वराज्य की हुँकार की “स्वराज्य हमारा जन्मसिध्द अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगें ।”, तब इसी कमजोर गाँधी ने अंग्रेजो से डरकर हमारे गरम दल के नेताओं (लाला जी, तिलक जी और विपिनचन्द्र पाल जी) का विरोध किया ।

                 From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar

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