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Tuesday, May 24, 2011

ग़ाँधी के सादे और संयमित भोजन का सच


   ग़ाँधी के आहार के प्रयोग बहुत मशहूर हैं ; पर बहुत कम लोग इसका सच जानते हैं । इस सिलसिले मे इंदुलाल याज्ञिक लिखते हैं –
    “मुझे तो उनके साथ जेल में रहने से पहले ही गाँधी जी के भोजन की मात्रा पर बडा विस्मय हुआ करता था । उदाहरण के लिये मैं यह देख आश्चर्यचकित रह जाता था कि जिन दिनों वह फ़लाहार करते थे उस समय वह अनगिनत केले और ढेर-सी मूँगफ़लियाँ खा डालते थे । नाडियाड मे किसान सत्याग्रह के अवसर पर मैं उन्हें इतनी रोटियाँ और इतनी बडी मात्रा मे दाल और चावल खाते देखता था कि मैं हैरान रह जाता था ।”
         नाडियाड , गुजरात के खेडा जिले का ही एक स्थान हैं जहाँ गाँधी ने अपने तथाकथित अंपग जीत के झंडे बुलन्द किए । आपने पढा ही है हमारे इस ब्लोग मे “अहमदाबाद आन्दोलन 1918” कि कैसे अहमदाबाद के किसान अन्न के दाने दाने को तरस रहे थे और गाँधी अपने उपदेश झाड रहे थे ।
एक पेटु ब्राह्मण की बात सुनाकर गाँधी ने खुद ही कहा था –
     “पर मुझे उस नादान ब्राह्मण पर हँसने का क्या अधिकार है, क्या मैं खुद खाने के मामले मे असंयम का अपराधी नहीं हूँ ? मैं खुद इतवार के व्रत की कसर पूरी करने के लिये अगली सुबह को दुगनी मात्रा मे खाना नहीं खा लेता ?” (गाँधीजी, पृ 211)
        ग़ाँधी का जीवन कभी भी सामान्य व्यक्तियों की तरह भी संयमित नही रहा, चाहे ये उसके बचपन का समय हो जब उसने अपने मित्र के साथ माँस खाने से भी परहेज नहीं किया, चाहे उसका युवाकाल जब वो विलायत मे वकालत की पढाई करने गया और मदिरा के साथ साथ स्त्रीसंग से यथायुक्ति विरक्ति नही कर पाया और चाहे खाने के सम्बन्ध मे उसका जीवन देख लीजिए जिसमे वह कभी भी अपनी जिव्हा को अपन नियंत्रण में नही कर पाया ।
        याज्ञिक जी गाँधी के साथ यरवदा जेल मे रहे थे, उन्होंने हमारे तथाकथित महात्मा के भोजन के बारे में असंयम की दिलचस्प घटनाएँ बयान की हैं । गाँधी ने खुद लिखा है –
     “उस वक्त मेरी खुराक खासतौर से थी मूँगफ़ली गुड मिलाकर, केले इत्यादि फ़ल और दो-तीन नींबुओं का रस । मैं जानता था कि मूँगफ़ली ज्यादा खाने से नुकसान करती है । फ़िर भी वह ज्यादा खाई गईं । इससे मामूली पेचिश हो गयी ।”
        इसी असंयमित जीवन का ही परिणाम था उसका गंदा स्वास्थ्य । ज़ीवन भर वो अपनी स्वादेंद्रिय की गुलामी करता रहा और इसी कारण से देश की पूर्ण स्वतंत्रता का स्वप्न भी कभी नही देख सका ।
     लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जिन्होने सर्वप्रथम पूर्ण स्वराज्य की हुँकार की “स्वराज्य हमारा जन्मसिध्द अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगें ।”, तब इसी कमजोर गाँधी ने अंग्रेजो से डरकर हमारे गरम दल के नेताओं (लाला जी, तिलक जी और विपिनचन्द्र पाल जी) का विरोध किया ।

                 From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar

Sunday, May 22, 2011

गुजरात के खेडा जिले का सत्याग्रह 1918


       अहमदाबाद के मज़दूरों के सत्याग्रह की तथाकथित सफ़लता के बाद गाँधी ने गुजरात के खेडा जिले का सत्याग्रह का काम हाथ में लिया । 1917 में अधिक बर्षा की वजह से खरीफ़ की फ़सल लगभग नष्ट हो गयी । रुपया मे तीन आने की भी आशा नहीं थी । इस जिले के किसान जागरुक थे वे कलेक्टर से मिले और कमिश्नर से भी अपील की । जब कहीं सुनवाई ना हुई तब वे मामला गाँधी के पास ले गये ।
      गाँधी आया और उसने नाडियाड की अनाथशाला मे डेरा डाला । चिलचिलाती धूप मे उसके स्वंसेवकों से उसकी रिपोर्ट तैयार की । उसने रिपोर्ट देखकर अनुमान लगाया कि लोगों की माँग इतनी साफ़ और हल्की है कि उसके लिये किसी लडाई की जरूरत ही नही है । उसने सम्बन्धित अधिकारियों से प्रार्थना की । अधिकारियों ने उसकी एक ना सुनी तब उसने सत्याग्रह करने का निर्णय लिया ।
      गाँधी ने एक बार फ़िर किसानों से एक प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर लिये जिसमे लिखा था –“हम नीचे सही करने वाले प्रतिज्ञा करते हैं कि हम सरकार का लगान अदा नहीं करेगें, पर उसे वसूल करने मे सरकार से होने वाली तकलीफ़ें बर्दाश्त करेगें । हम अपनी जमीन भी जब्त हो जाने देंगे पर लगान न देगें और यदि सरकार बची हुई दूसरी किस्त की वसूली सभी स्थानों पर माफ़ कर दे तो हममें से जो दे सकते हैं वे पूरा या बचा हुया बाकी लगान अदा करने को तैयार हैं।”
      अर्थात गाँधी ने जिस तरह अहमदाबाद के मज़दूरों के हाथ पाँव बांधे थे उसी तरह यहाँ भी किसानों को अपंग कर दिया और अपने लिये भाग निकलने का चोर दरवाजा खुला रखा ।

      तथाकथित सत्याग्रह शुरू हुया । सरकारी मशीनरी भी हरकत मे आई । किसानों की चल सम्पत्ति और जानवरों की कुर्की होने लगी । सरकार का दमन बढा तो आन्दोलन और उग्रतर होता गया । गाँधी ने इस पर प्रसन्न होने की वजाय खेद व्यक्त किया और उसने आन्दोलन रोक दिया ।
रोक देने का नतीजा यह हुया कि किसानो की हिम्मत टूट गयी । आखिर वे सरकारी दमन को कब तक चुपचाप सहते ? सरकार ने उनके जानवर बेंच डाले, घरों को लूट लिया, किसानों की सारी की सारी फ़सल कुर्क कर ली गयी । इससे लोगों मे घबराहट फ़ैली । किसानों ने लगान अदा कर दिया ।
       स्वयं गाँधी के शब्दों में – “इस लडायी का अन्त विचित्र रीति से हुया । यह बात साफ़ थी कि लोग थक चुके थे और जो दृढ थे उन्हें अन्त तक बर्बाद होने में संकोच हो रहा था । मेरा झुकाव इस ओर था कि निबटारे का कोइ ऐसा राश्ता निकल आये जो सत्याग्रही को फ़बता हो, तो उसे स्वीकार करना चाहिये । उसी समय नाडियाड ताल्लुके के तहसीलदार ने कहला भेजा कि अगर स्थिति वाले पाटीदार (किसान) लगान अदा कर दें तो गरीबों का लगान मुल्तवी (माफ़) कर दिया जयेगा । इस बिषय में मैंने लिखित स्वीकृति माँगी, वह मिल गयी । तहसीलदार अपनी ही तहसील की जिम्मेदारी ले सकता था, सारे जिले की जिम्मेदारी तो कलेक्टर ही ले सकता है । अत: मैंने कलेक्टर से पूछा, उनका उत्तर आया कि तहसीलदार ने जैसा कहा है वैसा हुक्म तो निकल ही चुका है । प्रतिज्ञा मे यही खास चीज थी । इससे इस हुक्म से हमने सन्तोष माना ।”
       देखा आपने फ़िर से गाँधी जीत गया, इसी को गाँधी की बडी जीत माना गया । ये तरीका था गाँधी की जीत का । और ये था इस सरकारी हुक्म का सच जिसे गाँधी की जीत समझा गया, गाँधी के ही शब्दों में – “गरीबों को छूट देने की बात थी, पर वो शायद ही बच पाये । गरीब कौन है ये कहने का अधिकार जनता ना अजमा सकी । जनता में यह शक्ति ना रह गयी थी, इसका मुझे दुख था ।”(आत्मकथा, पृ 530)
       जिस गाँधी ने स्वयं शक्तिशाली, संगठित एवं जागरूक जनता को अपंग कर दिया, कमजोर कर दिया, बाद में उसी का रोना रोया और उसी जनता को कमजोर कहा । और वाह रे गाँधी, फ़िर अपनी इसी अपंग सफ़लता को महान बनाकर इसका गुणगान किया ।

                         From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar


Friday, May 20, 2011

अहमदाबाद आन्दोलन 1918


          अहमदाबाद के एक मजदूरसंघ ने गाँधी को मजदूरों की रहनुमाई के लिये बुलाया । गाँधी ने स्वं अपनी अत्मकथा मे लिखा है : “मेरी स्थिति बहुत ही नाजुक थी । मजदूरों का पक्ष मुझे मजबूत जान पडा । मिल मालिकों से मेरा सम्बन्ध प्रेम का था । उनके साथ बातचीत करके मजदूरों की माँग के बारे में पंच चुनने की प्रार्थना की । पर मालिकों ने अपने और मजदूरों के बीच में पंच के बिचवई बनने का औचित्य स्वीकार नहीं किया ।
    मजदूरों को मैनें हड्ताल करने की सलाह दी । उन्हें हड्ताल की शर्तें समझाईं । वे थीं –
       1: किसी भी दशा मे शान्ति का भंग कदापि न करें ।
       2: जो काम पर जाना चाहे उस पर जोर-जबरदस्ती ना करें ।
       3: मज़दूर भीख पर ना जिएँ ।
       4: हडताल चाहे जितने दिन चले वे दृढ़ रहें और अपने पास पैसा न रह जाये तो दूसरी मज़दूरी करके खाने भर को कमा लें ।”
    गाँधी ने अपनी रहनुमाई की यह कीमत वसूल की कि मज़दूरों के हाथ पैर बाँध दिये । ज़ब ग़ाँधी आपना आश्रम चलाने के लिये सेठों से हजारों रूपया दान ले सकता था तो हडताल चलाने के लिये मज़दूर दूसरी मज़दूर यूनियनों से सहायता अथवा जनता से चन्दा नहीं ले सकते थे ? ग़ाँधी के अनुसार ये भीख थी ।
    ज़ब विदेशी कपडे और शराब की दुकानों पर लोगों को जबरदस्ती रोकना जायज था तो हडताल तोडने वाले पर जोर-जबरदस्ती करना जायज क़्यूँ नही था ?
    आज हम स्वतंत्र हैं, आज लोगों को पेट भरने लायक मज़दूरी नहीं मिलती तो उस गुलामी के समय पेट भरने लायक मजदूरी जब चाहो तब मिल जाती होगी, हैं ना ? वाह रे गाँधी ?
    ये सिर्फ़ एक सोचा समझा तरीका था मज़दूरों को थकाकर, हडताल विफ़ल करने का और पंच नियुक्ति का चोर दरवाजा तो खुला ही हुआ था । और यही हुआ भी, एक हफ़्ते बाद जब मजदूरों की सहनशक्ति जबाब देने लगी, गाँधी ने अपना पैंतरा बदला । मज़दूरों का श्रद्धापात्र बनने और समझौते की गुंजाइश पैदा करने के लिये उसने एक सभा में अचानक उपवास की घोषणा कर दी ।
     सत्य तो ये था कि मज़दूर भूख से बिलबिला कर पुकार उठे कि गाँधी को उपदेश देना शोभा देता है क्यूंकि हमें सभा में पहुँचने के लिये कई कई मील पैदल चल कर आना पडता है और वो मोटर पर उडे फ़िरते हैं, इधर तो हमें रोटी के सूखे टुकडे मयस्कर नहीं और उधर गाँधी जी के सामने तो ताजा फ़लों और मेवों का अम्बार लगा रहता है । ज्योंहि इसकी भनक गाँधी तक पहुँची, वह तिलमिला उठे। उसके महात्मापन को ठेस लगी ।
     अतएव उसने व्रत रहने का फ़ैसला किया, और बस तीसरे दिन ही मिल मालिकों ने पंच नियुक्त करने की बात मान ली । पंच थे उन्हीं लोगों के एक मित्र प्रोफ़ेसर और निर्णय था मिल मालिकों के ही पक्ष में । उस पंच ने जिस कटौती की सिफ़रिश की वह मिल मालिकों की प्रस्तावित कटौती से कुछ ही कम थी । और ये थी गाँधी की तथाकथित जीत, और इसी तरह की जीतों के गाँधी ने डन्के बजाये ।



                                              From : Gandhi Benaqaab By Hansraaj Rahbar

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